जन्मदिन विशेष : परदेस से देस के चांद को देखने वाले गंगा-जमुनी तहजीब के पैरोकार
नई दिल्ली, 31 अगस्त (आईएएनएस)। राही मासूम रज़ा एक ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी से हिंदी और उर्दू साहित्य को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। राही ही परदेस में रहकर देस के चांद को याद करते हुए लिख सकते हैं, 'हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद।' उनकी रचनाएं भारतीय संस्कृति की गंगा-जमुनी तहजीब की सुगंध बिखेरती हैं, जो सामाजिक एकता और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से दर्शाती हैं।