जलियांवाला बाग नरसंहार: जिस आवाज को गोलियों से दबाना चाहती थी अंग्रेजी हुकूमत, उसकी गूंज ने देशवासियों को किया आजादी के लिए एकजुट
नई दिल्ली, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। लगभग 107 बरस पहले जब पूरा हिंदुस्तान सहम गया था, मौत भी जिंदगी की भीख मांगने लगी थी और धरती ने इंसानी लाशों से अपनी कोख को ढक लिया था। 13 अप्रैल 1919 को बर्बरता की ऐसी पराकाष्ठा पार की गई कि आज भी दीवारों पर उसके निशान नजर आते हैं। आज भी वो निशान देखकर हर कोई सहम जाता है। यह कहानी है जलियांवाला बाग नरसंहार की, जब अंग्रेजों ने भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। ये बात और है कि ब्रिटेन ने आज तक भारत में किए अपने इस घृणास्पद कृत्य के लिए माफी नहीं मांगी है।