स्मृति शेष : 'दो निशान, दो प्रधान और दो विधान' के खिलाफ उठी वह आवाज, जिसकी आज भी गूंज मौजूद
नई दिल्ली, 22 जून (आईएएनएस)। 'या तो मैं आपको भारतीय संविधान दिलाऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।' साल 1952 में जम्मू-कश्मीर में आयोजित एक विशाल जनसभा में जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने यह संकल्प दोहराया था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि उनके जीवन का अंतिम व्रत साबित होगा।