अंतरराष्ट्रीय सांकेतिक भाषा दिवस: जब इशारों की जुबां बिना शोर कहती है कहानी, दिल तक पहुंचता हर एहसास
नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। जब जुबां खामोश होती है, तब भी बातें खत्म नहीं होतीं, बस उनका लहजा बदल जाता है। कभी आंखों से, कभी मुस्कुराहट से, तो कभी हाथों के इशारे से, यही सांकेतिक भाषा का वह असर है, जहां शोर नहीं होता, मगर एहसास दिल तक पहुंच जाता है। बधिर लोग भी हम और आप की तरह ही हंसते हैं, रोते हैं, नाराज होते हैं और दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उनकी दुनिया में आवाज की जगह इशारे बोलते हैं और उन इशारों में ही उम्मीद के सारे रंग बसे होते हैं।