इश्क और इंकलाब दोनों को जीने वाले हसरत मोहानी, हिंदू-मुस्लिम एकता और अखंड भारत के सच्चे पक्षधर
नई दिल्ली, 12 मई (आईएएनएस)। 13 मई 1951 में उर्दू साहित्य जगत में उस वक्त खालीपन आ गया, जब क्रांतिकारी शायर, स्वतंत्रता सेनानी और उर्दू साहित्य के अनमोल रत्न मौलाना हसरत मोहानी ने अंतिम सांस ली थी। 'इंकलाब जिंदाबाद' का अमर नारा देने वाले हसरत मोहानी मात्र एक शायर नहीं, बल्कि एक सच्चे विद्रोही, राष्ट्रवादी और अटूट साहस के प्रतीक थे।