नई दिल्ली, 13 अगस्त (आईएएनएस)। इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से कैश मिलने के मामले में गठित जांच समिति की रिपोर्ट पर रिटायर्ड जस्टिस एसएन. ढींगरा ने कहा कि रिपोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट कमेटी के निष्कर्षों की पुष्टि की है। रिटायर्ड जस्टिस ढींगरा ने सवाल उठाते हुए कहा कि कैश मिलने के पहले दिन ही एफआईआर होनी चाहिए थी, लेकिन 'ब्रदर जज' एक-दूसरे की रक्षा कर रहे हैं।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में गठित जांच समिति ने अपनी जांच पूरी कर 12 अगस्त, बुधवार को अपनी रिपोर्ट पेश की।
इस मामले को लेकर सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एसएन. ढींगरा ने आईएएनएस से कहा, "इस रिपोर्ट ने जस्टिस यसवंत वर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट कमेटी की रिपोर्ट को कन्फर्म किया है। रिपोर्ट ने ये कहा है कि उनके घर के स्टोर से जो कैश मिला है, उन्हीं का था और उन्हीं की जवाबदेही है। उन्होंने यह भी कोशिश की कि सबूतों को हटाया जाए। वो इस बात के लिए दोषी हैं।"
उन्होंने कहा, "मेरे हिसाब से इस मामले को इस आधार पर आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है, तो पार्लियामेंट कमेटी आगे नहीं बढ़ सकती। महाभियोग की कार्यवाही का उद्देश्य होता है कि कोई न्यायधीश, जिसने न्याय करते समय अनुचित व्यवहार किया हो, उसे संसद पद से हटा दे। अगर किसी ने अपने पद से पहले ही त्यागपत्र दे दिया है, तो संसद उसे कैसे हटाएगी? हमारे संविधान के अनुसार, अगर किसी जज ने अपने हाथ से इस्तीफा लिखकर राष्ट्रपति को दिया है, तो वो इस्तीफा उस दिन से लागू माना जाता है।"
उन्होंने कहा कि हालांकि, खबरों में मैंने पढ़ा है कि उन्हें अब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट न्यायधीश लिखा जा रहा है। ये क्यों लिखा जा रहा है, मैं नहीं जानता, लेकिन नियम के हिसाब से उनका इस्तीफा स्वीकृत माना जाएगा।
जस्टिस वर्मा के दोषी पाए जाने के बाद आपराधिक कार्रवाई के सवाल पर उन्होंने कहा कि जांच समिति खुद कोई कार्रवाई नहीं कर सकती। समिति का काम सिर्फ इतना था कि वह यह तय करे कि जस्टिस वर्मा दोषी हैं या नहीं। इस समिति का गठन लोकसभा स्पीकर ने किया था। अब आगे की कार्रवाई स्पीकर को ही करनी होगी। जस्टिस वर्मा इस्तीफा दे चुके हैं, इसलिए अब उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया नहीं चलाई जा सकती।
रिटायर्ड जज ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट एफआईआर के लिए दो याचिका पहले ही खारिज कर चुका है। एक याचिका इस आधार पर खारिज की गई कि उनके खिलाफ किसी ने शिकायत नहीं की। दूसरी याचिका को एससी ने वकील को डांटकर खारिज कर दिया। ये सभी 'ब्रदर जज' हैं। ये एक-दूसरे की रक्षा करते हैं। ये सुरक्षा कानून दे या ना दे, लेकिन ब्रदर जज को दे सकते हैं। इस मामले में एफआईआर पहले दिन होनी चाहिए थी, जब ये कैश मिला था। अंदाजा लगाया गया कि 15-50 करोड़ के बीच में कैश था। इतनी रकम मिलने के बाद एफआईआर तो होनी चाहिए थी, लेकिन नहीं हुई। दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को ये रिपोर्ट दी गई, तो वो निर्देश देते कि आप एफआईआर दर्ज करो, पता करो कि ये किसका पैसा है, कहां से आया, और ये जांच पुलिस को करनी चाहिए थी।"
उन्होंने आगे कहा कि अगर इसका लिंक जस्टिस वर्मा से मिलता, तब उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होनी चाहिए थी, क्योंकि पैसे लेना न्यायिक कार्रवाई नहीं है। ये काम दिल्ली हाईकोर्ट को करना चाहिए थी, सुप्रीम कोर्ट को करना चाहिए थी, लेकिन उन्होंने नहीं किया। इसका परिणाम यह है कि ऐसे जज छाती चौड़ी करके घूमते हैं। यह दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की जिम्मेदारी है। जब उनके पास रिपोर्ट गई थी, तो उन्हें तुरंत पुलिस को आदेश देना चाहिए था कि एफआईआर दर्ज करो और साइट को सीज करके सबूत इकट्ठे करो। जब तक ऊपर से आदेश न हो, तब तक अपने पद पर तैनात जज के खिलाफ पुलिस कुछ नहीं कर सकती है। हमारी पुलिस में इतनी हिम्मत नहीं है। वह हमारे विधायकों के खिलाफ कुछ नहीं करती है।
--आईएएनएस
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