जब फैज और साहिर के दौर में चमके थे मजाज लखनवी, जिनकी तस्वीरें तकिए के नीचे रखती थीं लड़कियां
नई दिल्ली, 18 अक्टूबर (आईएएनएस)। "सर शार-ए-निगाह-ऐ-नरिगस हूं, पाबस्ता-ए-गेसू-ऐ सुंबुल हूं। ये मेरा चमन है मेरा चमन, मैं अपने चमन का बुलबुल हूं।" शेर-ओ-अदब की महफिल में गजलों-नज्मों की जब बात छिड़ती है तो उस शायर का नाम छूट नहीं सकता, जिनकी शायरी आज भी लाखों लोगों के दिलों पर राज करती है। उनकी शोहरत का आलम यह था कि उनकी तस्वीरें लखनऊ और अलीगढ़ के लड़कियों के हॉस्टल में तकियों के नीचे मिलती थी। यह उर्दू शायरी का वह दौर था, जब शायर इश्क की दुनिया में सपनों के राजकुमार जैसी हैसियत रखते थे।