नई दिल्ली, 8 फरवरी (आईएएनएस)। साल की हर तारीख अपने आप में खास होती है। इसी तरह हर साल की 9 फरवरी उस महान आत्मा को याद करने का दिन है, जिसने समाज के उपेक्षित और तिरस्कृत लोगों को जीवन देने के साथ-साथ उन्हें सम्मान के साथ जीना सिखाया। ये नाम है बाबा आम्टे, उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि संवेदना अगर संकल्प बन जाती है, तो वह हजारों जिंदगियों को संवार देती है।
महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल एसएम कृष्णा ने उन्हें महान समाज सुधारक संत बताते हुए कहा था कि बाबा आम्टे ने कुष्ठरोग से प्रभावित लोगों को आत्मसम्मान के साथ जीने की राह दिखाई। उन्होंने सेवा को दया नहीं, बल्कि अधिकार और सम्मान का आंदोलन बना दिया।
मुरलीधर देवीदास आम्टे का जन्म 26 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के हिंगणघाट गांव में एक समृद्ध जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता, देवीदास हरबाजी आम्टे, शासकीय सेवा में लेखपाल थे, और परिवार आर्थिक रूप से बेहद संपन्न था। बाबा आम्टे का बचपन किसी राजकुमार से कम नहीं था, सोने के पालने में सोना, चांदी के चम्मच से भोजन करना और रेशमी कपड़े पहनना।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा नागपुर के क्रिश्चियन मिशन स्कूल में हुई और बाद में नागपुर विश्वविद्यालय से उन्होंने कानून की पढ़ाई की। उन्होंने लंबे समय तक वकालत भी की, लेकिन विवाह के बाद उनके जीवन की दिशा बदल गई। पत्नी साधना के साथ उन्होंने अपना जीवन समाजसेवा और दबे-कुचले लोगों की सेवा को समर्पित कर दिया।
उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब उन्होंने एक कुष्ठरोगी को मूसलाधार बारिश में भीगते देखा। कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आ रहा था। बाबा आम्टे के मन में सवाल उठा कि अगर इसकी जगह मैं होता तो? फिर क्या? उन्होंने बिना किसी हिचक के उस रोगी को उठाया और अपने घर ले आए। यही वह क्षण था, जब उन्होंने तय कर लिया कि वे अपना जीवन कुष्ठरोगियों की सेवा और उनके पुनर्वास के लिए समर्पित करेंगे। इसके बाद उन्होंने इस बीमारी को समझने और इससे जुड़े सामाजिक भय और भेदभाव को खत्म करने का संकल्प लिया।
वर्ष 1949 में बाबा आम्टे ने महारोग सेवा समिति की स्थापना की और कुष्ठरोगियों की संगठित सेवा शुरू की। उन्होंने सोमनाथ, अशोकवन जैसे कई सेवा संस्थानों की स्थापना की, जहां हजारों मरीजों का इलाज ही नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर रोगी से कर्मयोगी बनाया गया। उनका मानना था कि दया से ज्यादा जरूरी है सम्मान और स्वावलंबन।
महात्मा गांधी और विनोबा भावे से प्रभावित बाबा आम्टे ने देशभर का दौरा कर गांवों की वास्तविक समस्याओं को समझा। स्वतंत्रता आंदोलन में वे अमर शहीद राजगुरु के साथी भी रहे, लेकिन बाद में गांधीजी के संपर्क में आकर उन्होंने अहिंसा का मार्ग अपनाया। 1985 में उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत जोड़ो आंदोलन चलाया। इस यात्रा का उद्देश्य देश में एकता की भावना को मजबूत करना और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना था।
उनके असाधारण सामाजिक योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। इनमें पद्मश्री (1971), पद्म विभूषण (1986), मैगसेसे पुरस्कार (1985), महाराष्ट्र भूषण, गांधी शांति पुरस्कार और कई अन्य राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय सम्मान शामिल हैं।
9 फरवरी 2008 को बाबा आम्टे इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनकी विरासत आज भी हजारों जिंदगियों को संवार रही है। जाते-जाते उन्होंने समाज को यह सिखाया कि सेवा केवल सहायता नहीं, बल्कि किसी को उसका खोया हुआ सम्मान लौटाना है।
--आईएएनएस
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