भुवनेश्वर, 12 सितंबर (आईएएनएस)। भारत की अध्यक्षता में 18वें ब्रिक्स समिट को विदेश मामलों के एक्सपर्ट प्रोफेसर मानस बेहरा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था और भूराजनीतिक सिस्टम के लिए एक अहम कार्यक्रम बताया। उन्होंने कहा कि यह ग्रुप बहुध्रुवीय दुनिया के लिए एक अहम मंच के तौर पर उभर रहा है।
विदेश मामलों के एक्सपर्ट प्रोफेसर मानस बेहरा ने कहा कि भारत की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित 18वीं ब्रिक्स शिखर बैठक न केवल भारत या भारत के द्विपक्षीय संबंधों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। आप जानते हैं, पश्चिमी गुट के अलावा, यह 21 देशों का प्रतिनिधित्व करने वाला सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है। मूल रूप से 2009 में पांच देशों के साथ शुरू हुआ, अब यह 11 नियमित सदस्यों और 10 भागीदार सदस्यों तक विस्तारित हो गया है। यह दुनिया की 40 फीसदी जीडीपी और दुनिया की 49 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। यह रूस-यूक्रेन युद्ध और ईरान पर इजरायली-अमेरिकी हमले की पृष्ठभूमि में हाल के दिनों में बहुत बड़े अवसर और चुनौतियों वाला एक बहुत बड़ा संगठन है।
उन्होंने कहा कि आप मौजूदा हालात पर गौर करें तो पूरी एनर्जी सप्लाई चेन बिखर गई है, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोलियम, गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में ब्रिक्स अपना 18वां शिखर सम्मेलन कर रहा है। इस बार ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की थीम 'लचीलापन, नवाचार और टिकाऊ अर्थव्यवस्था' है। भारत दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि शांति, संवाद और बातचीत के जरिए कई बड़ी समस्याओं का हल निकाला जा सकता है और कई मुद्दों पर चर्चा की जा सकती है।
विशेषज्ञ बेहरा ने कहा कि रूस और चीन जैसे ताकतवर देशों के नेता भारत में हैं। हमने पहले ही रूसी राष्ट्रपति पुतिन, ईरानी राष्ट्रपति और कई अन्य वैश्विक नेताओं के साथ द्विपक्षीय बातचीत कर ली है और चीन के साथ भी द्विपक्षीय चर्चा हुई है। ब्रिक्स से क्या हासिल होगा? ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती बहुध्रुवीय दुनिया के रोडमैप पर आगे बढ़ना है, क्योंकि अमेरिका की थोपी हुई एकतरफा विश्व व्यवस्था, खासकर ईरान-अमेरिका तनाव के बाद, अब दुनिया में टिकाऊ नहीं रही। दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है और इसमें ब्रिक्स की अहम भूमिका है। दूसरी चुनौती डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देना है। जैसा कि कई नेताओं ने संकेत दिया है, ब्रिक्स देश आपस में डॉलर में नहीं बल्कि अपनी-अपनी मुद्राओं में कारोबार करेंगे। यह डॉलर के दबदबे के लिए एक चुनौती तो है, लेकिन यह सम्मेलन डॉलर को पूरी तरह से खत्म करने वाला नहीं है।
उन्होंने कहा कि यह एक नई शुरुआत है, हालांकि एक लंबे रास्ते के साथ। दूसरा प्रमुख मुद्दा जलवायु परिवर्तन है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आतंकवाद, विश्व शांति के साथ विश्व सुरक्षा भी मुद्दे हैं। ईरान आ गया है। भारत प्रत्येक ब्रिक्स राष्ट्र के साथ द्विपक्षीय संबंध स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। अब तक भारत-रूस संबंध की बात है, यह एक नए स्तर पर जा रहा है। लक्ष्य 2030 तक 100 अरब डॉलर का व्यापार है। रूस के साथ हमारे रक्षा समझौते का विस्तार करने, एस-400, एस-500 प्राप्त करने, ब्रह्मोस मिसाइल को अपग्रेड करने और अत्यधिक उन्नत लड़ाकू विमान एस-57 प्राप्त करने पर चर्चा है। यह एक नया क्षेत्र है। फिर इस्पात, रेलवे, अंतरिक्ष, कृषि, और उर्वरक के क्षेत्रों में, रूस के साथ व्यापार का विस्तार होगा।
उन्होंने कहा कि पीएम मोदी और ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन हाथ मिलाकर आगे बढ़ रहे हैं। इसके जरिए भारत यह संदेश देना चाहता है कि हम ईरान के पुराने और करीबी दोस्त हैं। दोनों के बीच व्यापार को बढ़ाया जा सकता है, भले ही उस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगे हुए हैं। यह एक तरह से अमेरिकी प्रतिबंधों को सीधी चुनौती है। जब हम रूस से तेल खरीदते हैं तो अमेरिका का दबाव रहता है, लेकिन इसके बावजूद पुतिन और पीएम मोदी की मुलाकात और बातचीत जारी है। हम निश्चित तौर पर इस ऊर्जा कारोबार को और बढ़ाएंगे, क्योंकि हम अपनी करीब 43 प्रतिशत ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से आयात कर रहे हैं। अब बड़ा सवाल भारत-चीन संबंधों को लेकर है। भले ही दोनों देशों के बीच सीमा और व्यापार समेत कई प्राकृतिक चुनौतियां हैं, लेकिन संकेतों से लग रहा है कि दोनों पक्षों में सहमति बनी है, क्योंकि शी जिनपिंग एक बड़ी टीम के साथ भारत आए हैं।
उन्होंने कहा कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष पोलित ब्यूरो के सदस्य, विदेश मंत्री, व्यापार मंत्री और वाणिज्य मंत्री भी भारत आए हैं और बातचीत कर रहे हैं। ऐसे में भारत-चीन कारोबार के विस्तार की पूरी संभावना है, जो एक अच्छा संकेत है। इस तरह ब्रिक्स एक बहुध्रुवीय मंच के रूप में उभर रहा है और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के वर्चस्व को चुनौती दे रहा है।
--आईएएनएस
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