बंगाल चुनाव : जयनगर सीट पर दिलचस्प मुकाबला, कभी था एसयूसीआई(सी) का दबदबा, अब टीएमसी का गढ़

पश्चिम बंगाल चुनाव: जयनगर सीट पर दिलचस्प है मुकाबला, कभी था एसयूसीआई(सी) का दबदबा, अब टीएमसी का गढ़

कोलकाता, 13 मार्च (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल की सियासत में कई विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिनका इतिहास जितना दिलचस्प है, उतना ही जटिल है। दक्षिण 24 परगना जिले की जयनगर सीट भी उन्हीं में से एक है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित यह सीट राजनीतिक उतार-चढ़ाव और बदलते जनादेश की कहानी है। कभी एसयूसीआई(सी) का मजबूत गढ़ रही यह सीट अब तृणमूल कांग्रेस के कब्जे में है, जबकि भाजपा यहां लगातार अपनी चुनौती मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

यह सीट दक्षिण 24 परगना जिले में आती है और इसके केंद्र में जयनगर मजलपुर नगर पालिका क्षेत्र है। आधिकारिक तौर पर शहर का नाम जयनगर मजीलपुर है, लेकिन चुनाव आयोग अपने रिकॉर्ड में इसे जयनगर विधानसभा क्षेत्र के रूप में दर्ज करता है। यह सीट जयनगर लोकसभा क्षेत्र के सात विधानसभा खंडों में से एक है।

विधानसभा क्षेत्र की भौगोलिक संरचना भी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करती है। इसमें जयनगर मजीलपुर नगरपालिका के अलावा जयनगर-1 ब्लॉक की छह ग्राम पंचायतें और जयनगर-2 ब्लॉक की छह ग्राम पंचायतें शामिल हैं। यही वजह है कि यहां ग्रामीण और शहरी मतदाताओं का मिश्रित चरित्र देखने को मिलता है।

जयनगर सीट का इतिहास भी कई मोड़ों से गुजरा है। इसे 1951 में दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र के रूप में बनाया गया था। शुरुआती दौर में यहां वामपंथी राजनीति का जबरदस्त प्रभाव रहा और सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (कम्युनिस्ट) ने 1952 और 1957 के चुनावों में सभी चार सीटों पर जीत दर्ज कर राजनीतिक पकड़ मजबूत की। इसके बाद, 1962 में इस सीट को दो हिस्सों, जयनगर उत्तर और जयनगर दक्षिण, में बांट दिया गया। उस चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस ने दोनों सीटें जीत लीं। बाद में इन दोनों क्षेत्रों को फिर से मिलाकर 1967 में जयनगर के रूप में बहाल किया गया।

1967 से लेकर लंबे समय तक इस सीट पर एसयूसीआई(सी) का प्रभाव रहा। पार्टी ने 1967, 1969 और 1972 में लगातार जीत हासिल की। 1972 में कांग्रेस ने एक बार फिर यहां जीत दर्ज की, लेकिन इसके बाद 1977 से लेकर 2011 तक एसयूसीआई(सी) ने लगातार आठ चुनाव जीतकर इस क्षेत्र को अपना मजबूत गढ़ बना लिया।

कुल मिलाकर इस सीट पर एसयूसीआई(सी) ने 13 बार जीत दर्ज की है, जबकि कांग्रेस और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस को दो-दो बार सफलता मिली है।

2011 के चुनाव से पहले जयनगर सीट को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। उसी चुनाव में एसयूसीआई(सी) के उम्मीदवार तरुण कांति नास्कर ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की श्यामली हल्दर को हराया। लेकिन, 2016 का चुनाव इस सीट के इतिहास में बड़ा मोड़ साबित हुआ। तृणमूल कांग्रेस ने एसयूसीआई(सी) के मजबूत किले में सेंध लगाते हुए पहली बार जीत हासिल की। पार्टी के उम्मीदवार बिस्वनाथ दास ने कांग्रेस के सुजीत पटवारी को 15,051 वोटों से हराया और एसयूसीआई(सी) तीसरे स्थान पर चली गई।

2021 के विधानसभा चुनाव में बिस्वनाथ दास ने एक बार फिर जीत दर्ज करते हुए सीट पर तृणमूल का कब्जा बरकरार रखा।

जयनगर विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है। यहां करीब 70.30 प्रतिशत मतदाता गांवों में रहते हैं, जबकि लगभग 29.70 प्रतिशत आबादी शहरी इलाकों में है। मतदान प्रतिशत भी हमेशा ज्यादा रहा है। 2011 में यहां 91.80 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि 2021 में भी 84.36 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।

जयनगर मजीलपुर का इतिहास भी कम रोचक नहीं है। कभी यह इलाका सुंदरवन का हिस्सा हुआ करता था। समय के साथ जंगलों को साफ कर खेती और बस्तियां बसाई गईं, जिससे यह इलाका आबादी और व्यापार का केंद्र बन गया। कोलकाता से लगभग 50 किलोमीटर दक्षिण में स्थित यह शहर आज सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का अहम केंद्र है। यहां बनने वाली प्रसिद्ध मिठाई पूरे बंगाल में मशहूर है।

जयनगर की अर्थव्यवस्था मिश्रित है। ग्रामीण इलाकों में खेती और मछली पालन प्रमुख आजीविका हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में व्यापार और सेवा क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कई लोग रोजाना कोलकाता जाकर काम करते हैं। यातायात की दृष्टि से भी यह इलाका अच्छी तरह जुड़ा है।

--आईएएनएस

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