लाहौर जेल में 63 दिन तक भूखे रहकर जतिंद्र नाथ दास ने जगाई थी आजादी की अलख, सुभाष चंद्र बोस ने कहा था 'युवा दधीचि'

लाहौर जेल में 63 दिन तक भूखे रहकर जतिंद्र नाथ दास ने जगाई थी आजादी की अलख, सुभाष चंद्र बोस ने कहा था 'युवा दधीचि'

नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। स्वतंत्रता दिवस भारत के इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ की याद दिलाता है, जब भारत दो शताब्दियों से अधिक के ब्रिटिश उपनिवेशवाद से मुक्त हुआ। 15 अगस्त, 1947 को हमारा देश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना था। संप्रभुता पाने के साथ-साथ उसी दिन से देश की नियति तय करने की जिम्मेदारी भी ब्रिटिश हुकूमत के हाथों से निकलकर हम भारतवासियों के पास आ गई थी।

वास्तव में वह सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण नहीं था। वह एक बहुत बड़े और व्यापक बदलाव की घड़ी थी। समूचे देश के सपनों के साकार होने का पल था, ऐसे सपने जो हमारे पूर्वजों और स्वतंत्रता सेनानियों ने देखे थे। अब हम एक नए राष्ट्र की कल्पना करने और उसे साकार करने के लिए आजाद थे। स्वतंत्र भारत का उनका सपना, हमारे गांव, गरीब और देश के समग्र विकास का सपना था।

आजादी के लिए पूरा देश उन सभी अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों के ऋणी है जिन्होंने इसके लिए कुर्बानियां दी थीं। कित्तूर की रानी चेन्नम्मा, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, भारत छोड़ो आंदोलन की शहीद मातंगिनी हाजरा जैसी वीरांगनाओं के अनेक उदाहरण हैं।

मातंगिनी हाजरा लगभग 70 साल की बुजुर्ग महिला थीं। बंगाल के तामलुक में एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करते समय ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गोली मार दी थी। 'वंदे मातरम्' उनके होठों से निकले आखिरी शब्द थे और भारत की आजादी, उनके दिल में बसी आखिरी इच्छा।

स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता भी भारत की माटी के लिए समर्पित थीं। मूल रूप से आइरिश मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल को भगिनी निवेदिता का नाम स्वामी विवेकानंद ने ही दिया था जिसका अर्थ 'ईश्वर को समर्पित' होता है। उनका नाम उन विदेशी महिलाओं में शामिल हैं जिन्होंने अपना जीवन भारतीयों की सेवा में लगा दिया। भगिनी निवेदिता ने हमेशा भारत को अपनी मातृभूमि समझा। यही कारण है कि उन्होंने भारत में स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का समर्थन किया, उन्हें सहयोग दिया और भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया।

देश के लिए जान की बाजी लगा देने वाले सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और बिरसा मुंडा जैसे हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को पूरा देश कभी नहीं भुला सकता।

आजादी की लड़ाई की शुरुआत से ही अनेक महापुरुषों और क्रांतिकारियों का उद्देश्य सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था। महात्मा गांधी ने समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण पर बल दिया था। गांधीजी ने जिन सिद्धांतों को अपनाने की बात कही थी, वे हमारे लिए आज भी प्रासंगिक हैं। राष्ट्रव्यापी सुधार और संघर्ष के इस अभियान में महात्मा गांधी अकेले नहीं थे।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जब 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' का आह्वान किया तो हजारों-लाखों भारतवासियों ने उनके नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ते हुए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

हमें जिस पीढ़ी ने स्वतंत्रता दिलाई, उसका दायरा बहुत व्यापक था, उसमें बहुत विविधता भी थी। उसमें महिलाएं भी थीं और पुरुष भी, जो देश के अलग-अलग क्षेत्रों और विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्हीं में से जतिंद्र नाथ दास भी थे।

जतिंद्र नाथ दास एक ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अपने 63 दिन की भूख हड़ताल भी जिनका हौसला नहीं तोड़ सकी। संघर्ष के दम पर एक बार नहीं, बल्कि कई बार ब्रिटिश हुकूमत की नींव को हिला कर रख दिया था। जब वह शहीद हुए थे, तब सुभाष चंद्र बोस ने कहा था 'जिस तरह महर्षि दधीचि ने वज्र बनाने के लिए अपनी अस्थियां दान कर दी थीं उसी तरह जतिंद्र ने भी अपना शरीर दान कर दिया है। वो आधुनिक भारत के युवा दधीचि हैं।'

उन्होंने 1928 की कोलकाता कांग्रेस में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सहायक के रूप में भी काम किया था। बाद में भगत सिंह के अनुरोध पर वह बम बनाने के लिए आगरा चले गए। माना जाता है कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय असेंबली में जो बम फेंका था वह बम जतिंद्र नाथ दास ने ही बनाए थे। उन पर लाहौर षड्‌यंत्र केस का मुकदमा चलाया गया। जेल में जतिंद्र नाथ दास ने भारत के राजनीतिक कैदियों की दुर्दशा देख उनके साथ यूरोपीय कैदियों की तरह व्यवहार करने की मांग की और लाहौर जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी। 63 दिन तक भूखे रहने के बाद महज 25 साल की उम्र में वह 13 सितंबर को शहीद हो गए।

इसी तरह आचार्य नरेंद्र देव भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, विद्वान, शिक्षाविद और साहित्य में रुचि रखने वाले एक समाजवादी नेता थे। देश को आजाद देखने का उनका सपना ही थी कि वह स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलनों से जुड़ गए और अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने के लिए निरंतर संघर्षरत रहे। उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था और कई बार जेल गए। आचार्य जी एक कुशल और सच्चे सत्याग्रही थे और यही कारण है कि गांधी ने स्वयं उन्हें 'रत्न' कहा था।

माना जाता है कि इलाहाबाद प्रवास के दौरान अपने प्रारंभिक जीवन में वह बाल गंगाधर तिलक, लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष और अन्य नेताओं से बहुत प्रभावित थे। देश आजाद होने के बाद भी आचार्य नरेंद्र देव राष्ट्र की सेवा में लगे रहे और उसके नव-निर्माण के लिए लगातार काम करते रहे।

आज देश के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर स्वतंत्रता सेनानियों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ने का समय है। आज देश के लिए कुछ कर गुजरने की उसी भावना के साथ राष्ट्र निर्माण में सतत जुटे रहने का समय है।

अब, जब भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने की ओर अग्रसर है, यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि देश ने औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। बीते 12 सालों में अनेक ऐसे प्रयास हुए हैं, जिन्होंने भारत की आत्मनिर्भर और गौरवशाली पहचान को नई ऊंचाई दी है।

नए संसद भवन का निर्माण, राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ रखने, इंडिया गेट पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित करने, नए आपराधिक कानून लाने, नए नौसेना ध्वज को अपनाने, रेल बजट को वार्षिक बजट में समाहित करने, ब्रिटिश शासनकाल में प्रतिबंधित साहित्यिक कृतियों के पुनर्प्रकाशन और बजट प्रस्तुति में पारंपरिक 'बही खाता' के प्रयोग जैसे कदमों ने भारत की सांस्कृतिक चेतना को नई पहचान दी है।

--आईएएनएस

डीसीएच/वीसी