मुंबई, 12 अगस्त (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा की दिवंगत एक्ट्रेस श्रीदेवी पर्दे पर कभी चुलबुली दिखीं, कभी गंभीर और कभी ऐसी भूमिका में नजर आईं, जिसे देखकर दर्शक हैरान रह गए। उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्मों से शुरुआत की और फिर हिंदी सिनेमा में अपनी अलग जगह बनाई। लेकिन, उनके करियर का एक दिलचस्प सच यह भी था कि जिस फिल्म ने उन्हें बॉलीवुड में बड़ा स्टार बना दिया, उसी की सफलता को वह अपने लिए पूरी तरह अच्छा नहीं मानती थीं। यह बात 'श्रीदेवी: क्वीन ऑफ हार्ट्स' नामक किताब में दर्ज है।
श्रीदेवी का जन्म 13 अगस्त 1963 को तमिलनाडु के शिवकाशी में हुआ था। उनका असली नाम श्री अम्मा यंगर अय्यपन था। उन्होंने बहुत छोटी उम्र में फिल्मों में काम शुरू कर दिया था। वह करीब चार साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में दक्षिण भारतीय सिनेमा में नजर आईं। तमिल, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ फिल्मों में काम करते हुए उन्होंने बचपन में ही अपनी पहचान बना ली थी। उन्हें मलयालम फिल्म 'पूमपट्टा' में अभिनय के लिए केरल राज्य फिल्म पुरस्कार भी मिला।
बड़ी होने के बाद भी श्रीदेवी ने दक्षिण भारतीय सिनेमा में लगातार काम किया। 1976 की तमिल फिल्म 'मूंद्रु मुदिचु' में उन्होंने रजनीकांत और कमल हासन जैसे कलाकारों के साथ काम किया। इसके बाद '16 वैयाथिनिले', 'सिगप्पु रोजक्कल' और 'मूंद्रम पिराई' जैसी फिल्मों ने उन्हें दक्षिण की बड़ी अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया। हिंदी फिल्मों में उनकी पहली मुख्य भूमिका 1979 की 'सोलवा सावन' में थी। हालांकि यह फिल्म उन्हें वह पहचान नहीं दिला सकी, जिसकी उन्हें तलाश थी।
फिर 1983 में आई 'हिम्मतवाला' और सब कुछ बदल गया। जीतेंद्र के साथ आई इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार प्रदर्शन किया। फिल्म के गाने, श्रीदेवी के कपड़े और उनका डांस लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। वह अचानक हिंदी फिल्मों की सबसे चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं। लेकिन यहीं से उनके मन में एक अजीब सा डर भी पैदा हुआ।
'श्रीदेवी: क्वीन ऑफ हार्ट्स' किताब में उनके पुराने इंटरव्यू के हवाले से बताया गया है कि श्रीदेवी 'हिम्मतवाला' की सफलता को अपनी बदकिस्मती मानती थीं। वजह यह थी कि उन्हें डर था कि इस फिल्म की कामयाबी के बाद लोग उन्हें सिर्फ खूबसूरत और ग्लैमरस अभिनेत्री के रूप में देखेंगे और उनके अभिनय को गंभीरता से नहीं लेंगे।
उनका यह डर पूरी तरह बेबुनियाद भी नहीं था। 'हिम्मतवाला' के बाद उनकी कई फिल्में व्यावसायिक थीं, लेकिन श्रीदेवी खुद यह साबित करना चाहती थीं कि वह सिर्फ गानों और ग्लैमर के लिए नहीं हैं। इससे पहले 'सदमा' जैसी फिल्म में उनके अभिनय की खूब तारीफ हुई थी, लेकिन वह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थी। श्रीदेवी को लगता था कि 'सदमा' जैसी भूमिका से वह बताना चाहती थीं कि उनके अंदर गंभीर अभिनय की भी पूरी क्षमता है। आगे चलकर उन्होंने इसी बात को अपने काम से साबित किया।
1980 का दशक उनके करियर का सबसे बड़ा दौर बना। 'तोहफा', 'नगीना', 'मिस्टर इंडिया', 'चांदनी', 'चालबाज' और 'लम्हे' जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग तरह की भूमिकाएं निभाईं। 'मिस्टर इंडिया' में उनकी कॉमेडी और 'हवा हवाई' वाला अंदाज लोगों को खूब पसंद आया। 'चालबाज' में उन्होंने दो अलग स्वभाव वाली बहनों का किरदार निभाकर अपनी अभिनय क्षमता दिखाई। वहीं, 'लम्हे' में उन्होंने एक ही फिल्म में अलग उम्र और अलग भावनाओं वाले किरदारों को निभाया। इस दौर में वह ऐसी महिला स्टार बन चुकी थीं, जिनके नाम पर फिल्म चलने की क्षमता थी।
श्रीदेवी ने शादी के बाद धीरे-धीरे फिल्मों से दूरी बना ली। 1996 में उन्होंने फिल्म निर्माता बोनी कपूर से शादी की। उनकी दो बेटियां जान्हवी और खुशी कपूर हैं। 1997 की 'जुदाई' के बाद उन्होंने लंबे समय तक फिल्मों से दूरी बनाए रखी। करीब 15 साल बाद 2012 में 'इंग्लिश-विंग्लिश' से उन्होंने बड़े पर्दे पर वापसी की। इस फिल्म में उन्होंने एक सामान्य गृहिणी का किरदार निभाया, जो अंग्रेजी सीखकर अपने आत्मविश्वास को वापस पाती है।
इसके बाद उन्होंने 'मॉम' फिल्म में काम किया, जो 2017 में रिलीज हुई। यह उनकी आखिरी पूरी फिल्म थी। उनके करियर को कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें कई बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला और 2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। उन्हें भारतीय सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार के रूप में भी व्यापक तौर पर याद किया जाता है।
श्रीदेवी का निधन 24 फरवरी 2018 को दुबई में हुआ। वह सिर्फ 54 साल की थीं। उनके निधन की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया।
--आईएएनएस
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