नई दिल्ली, 29 जनवरी (आईएएनएस)। एक बेदाग और कर्मठ कार्यकर्ता , जिसने भाजपा के जन्म से लेकर शिखर तक पहुंचने का सफर साथ तय किया है। एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में उनकी यात्रा अभी जारी है। बात हो रही है केंद्रीय मंत्री रह चुके भाजपा के वरिष्ठ नेता प्रकाश जावड़ेकर की। उन्होंने पार्टी और सरकार में कई भूमिकाएं निभाईं और सभी जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी व लगन से निभाया।
30 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के पुणे में जन्मे प्रकाश जावडेकर जीवनभर भाजपा में एक योद्धा की तरह रहे हैं। उनकी जिंदगी से जुड़ा एक ऐसा भी किस्सा है, जब लोग उन्हें मुस्लिम समझ बैठे थे और अखबारों में एक नए मुस्लिम चेहरे के रूप में उन्हें पेश किया जा चुका था। यह किस्सा देश में आए नागरिकता कानून के समय सुनने को मिला था।
जब नागरिकता कानून के विरोध में जन आक्रोश दिखाई दे रहा था। भ्रम की स्थिति में लोग पूरा कानून जाने बस सड़क पर हंगामा करने को उतारू थे। तब सरकार और भाजपा ने तय किया कि मुस्लिमों के बीच कुछ नेताओं को भेजा जाए, ताकि उन्हें समझाया जा सके कि नागरिकता कानून से किसी भी भारतीय की नागरिकता नहीं जाएगी। इसको लेकर दिल्ली में एक बैठक हुई। उसमें भाजपा के कई बड़े नेता उपस्थित थे, तभी प्रकाश जावड़ेकर को लेकर मजेदार वाक्या सुनने को मिला।
उस वक्त पर जब बैठक चल रही थी, तब भाजपा नेता शाहनबाज हुसैन भी उसमें मौजूद थे। वे प्रकाश जावड़ेकर को 'जावेद भाई' कहकर बुला रहे थे। बैठक में लोग चौंक रहे थे कि शाहनबाज हुसैन उन्हें 'जावेद भाई जान' क्यों कह रहे हैं। इस पर शाहनवाज हुसैन ने एक किस्सा सुनाया। शाहनवाज हुसैन के अनुसार, दोनों को एक साथ जम्मू-कश्मीर जाने का मौका मिला था। एक प्रतिनिधिमंडल के तौर पर दोनों वहां पहुंचे थे। जब शाहनवाज हुसैन और प्रकाश जावड़ेकर जम्मू पहुंचे, तब वहां के अखबारों ने जावड़ेकर के नाम को 'जावेदकर' लिख दिया था। अखबारों ने यह भी लिख दिया था कि भाजपा का यह नया मुस्लिम चेहरा है, जिसे पार्टी जम्मू-कश्मीर में उतारना चाहती है।
इस तरह प्रकाश जावड़ेकर 'जावेद' बन चुके थे। अक्सर शाहनबाज हुसैन चुटकी लेते हुए उन्हें इसी नाम से बुला लेते हैं। कुछ अन्य भाजपा नेताओं ने भी इस पर चुटकी लेना शुरू कर दिया था कि जावड़ेकर को ही मुस्लिमों के बीच भेजा जाना चाहिए, क्योंकि वे 'जावेद भाई' हैं। समाचार लेखों में शाहनबाज हुसैन के हवाले से इस किस्से का जिक्र मिलता है।
प्रकाश जावड़ेकर के राजनीतिक जीवन की कहानी आरएसएस के विचारों के साथ शुरू हुई थी। 1969 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के साथ यात्रा उनके राजनीतिक सफर की एक महत्वपूर्ण सीढ़ी थी। 1972 में गोपीनाथ मुंडे के नेतृत्व में वे छात्रों की एक समिति के सचिव थे, जिसने जयप्रकाश नारायण को सम्मानित किया था। पुणे के एमईएस कॉलेज ऑफ कॉमर्स में अपने कॉलेज के दिनों में, वे इतिहास के प्रख्यात प्रोफेसर श्रीपति शास्त्री और आरएसएस प्रचारक दामू अन्ना दते के संपर्क में आए, जिन्होंने उनकी राजनीतिक विचारधारा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एबीवीपी के प्रोफेसर यशवंतराव केलकर और प्रोफेसर बाल आप्टे भी उन दिनों उनके लिए बहुत प्रभावशाली रहे।
इन दिनों एक सक्रिय छात्र नेता के रूप में उन्होंने विभिन्न छात्र आंदोलनों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। निस्वार्थ और समर्पित कार्यों के कारण छात्रों के बीच उनकी लोकप्रियता को देखते हुए वे 1975 में पुणे विश्वविद्यालय के सीनेट सदस्य चुने गए। उनके नेतृत्व में एबीवीपी ने आपातकाल शासन के विरोध में 11 दिसंबर 1975 को सुबह 11 बजे पुणे के 11 कॉलेजों में सत्याग्रह का आयोजन किया। छात्र नेता और सीनेट सदस्य के रूप में उन्होंने खुद पुणे विश्वविद्यालय परिसर में सत्याग्रह किया। जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर येरवडा जेल में डाल दिया गया।
जेल में भी उन्होंने अपने साथी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर 'निर्भय' नामक एक साप्ताहिक पत्रिका शुरू की, जो वहां के लगभग 400 राजनीतिक कैदियों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गई। येरवडा जेल में बंद तत्कालीन आरएसएस प्रमुख बालासाहेब देवरस से प्रभावित होकर उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ जेल के अंदर आपातकाल के खिलाफ कई कार्यक्रम आयोजित किए। यह प्रकाश जावडेकर के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इसके बाद से वे हमेशा सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के समय ही उसमें शामिल हो गए थे।
पार्टी के काम पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रकाश जावडेकर ने 1981 में बैंक ऑफ महाराष्ट्र से इस्तीफा दे दिया और पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम करना शुरू कर दिया। उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा (बीजेवाईएम) के महासचिव का दायित्व सौंपा गया। उन्होंने महाराष्ट्र राज्य में अथक परिश्रम किया और अगले ही वर्ष उन्हें बीजेवाईएम की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य और बीजेवाईएम के बेरोजगारी प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया। उन्होंने बेरोजगारी से संबंधित मुद्दों पर व्यापक रूप से लिखा और राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी के मुद्दे पर विभिन्न विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया।
प्रकाश जावडेकर ने अन्य नेताओं के साथ मिलकर महाराष्ट्र भर में 'संघर्ष रथ' यात्रा का नेतृत्व किया। 10 मार्च 1989 को मुंबई में हजारों युवाओं को एकजुट किया। प्रकाश जावड़ेकर.कॉम पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह अपनी तरह का पहला 'रथ' था, जिसे बीजेवाईएम या भाजपा की ओर से निकाला गया था।
2008 में उन्हें महाराष्ट्र से राज्यसभा भेजा गया था। पार्टी के एक वफादार सिपाही के तौर पर उन्होंने 2014 में गठबंधन सहयोगी रामदास आठवले के लिए राज्यसभा सीट खाली कर दी थी, हालांकि पार्टी ने उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा भेज दिया। उन्हें पहली बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले मंत्रिमंडल में पर्यावरण राज्य मंत्री के तौर पर स्वतंत्र प्रभार दिया गया था।
बाद में उन्होंने कुछ समय के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय भी संभाला और आखिर में उन्हें मानव संसाधन विकास का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। भाजपा में संकटमोचक के तौर पर जाने जाने वाले उन्हें कर्नाटक विधानसभा चुनावों और राजस्थान में लोकसभा चुनावों के दौरान जिम्मेदारी दी गई थी।
--आईएएनएस
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