नई दिल्ली, 2 मई (आईएएनएस)। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के जरिए भारत अपनी भौगोलिक स्थिति के फायदे को आर्थिक मजबूती, रणनीतिक गहराई और समुद्री प्रभाव में बदल सकता है।
यह द्वीप दूर स्थित है, प्रोजेक्ट महंगा है और इसके क्रियान्वयन में जोखिम भी हैं। लेकिन इसकी मूल सोच — कि अगर किसी भौगोलिक क्षेत्र का उपयोग नहीं किया जाए तो वह खो जाता है — सही है। यह बात वैश्विक वित्तीय नीति में विशेषज्ञता रखने वाले प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री हैन्स कॉफमैन ने 'इंडिया नैरेटिव' में लिखी है।
उन्होंने यह भी कहा कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट चीन को सैन्य रूप से 'घेरने' के लिए नहीं है, क्योंकि दूरी और सैन्य ताकत के अंतर के कारण यह संभव नहीं है।
लेकिन यह भारत को उस समुद्री रास्ते के पास निगरानी, लॉजिस्टिक मजबूती और रणनीतिक स्थिति देता है, जिस पर चीन की अर्थव्यवस्था काफी हद तक निर्भर है।
उन्होंने कहा, "अगर भारत इसे सही तरीके से बनाता है, तो यह आजादी के बाद का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर फैसला होगा। लेकिन अगर इसे लापरवाही से बनाया गया, तो एक अनमोल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर अधूरा पोर्ट ही मिलेगा। फर्क महत्वाकांक्षा में नहीं, बल्कि बेहतर प्रबंधन (गवर्नेंस) में है।"
सरकार के अनुसार, इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य ग्रेट निकोबार को एक रणनीतिक समुद्री और आर्थिक हब में बदलना है। यह वैश्विक पूर्व-पश्चिम शिपिंग रूट के पास स्थित है और इससे विदेशी ट्रांसशिपमेंट पोर्ट्स पर निर्भरता कम होगी, जो भारत की रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
यह प्रोजेक्ट अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की रणनीतिक मौजूदगी को मजबूत करेगा। साथ ही, इसमें आर्थिक विकास के साथ पर्यावरण सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की रक्षा का भी ध्यान रखा जाएगा।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत हिंद महासागर के किनारे स्थित है और उसके पास लंबी समुद्री तटरेखा है, फिर भी वर्षों से वह अपने ही माल की ढुलाई के लिए सिंगापुर, कोलंबो और पोर्ट क्लांग जैसे विदेशी पोर्ट्स पर निर्भर रहा है।
हर साल लगभग 30 लाख कंटेनर (टीईयू) भारतीय माल विदेशी पोर्ट्स के जरिए भेजा जाता है, जिनमें से 85 प्रतिशत से ज्यादा सिर्फ तीन पोर्ट्स संभालते हैं।
इस वजह से भारत को हर साल करीब 200-220 मिलियन डॉलर का नुकसान होता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि "भारत अपने ही क्षेत्र में एक तरह से किराएदार जैसा रहा है। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट इस स्थिति को बदलने का पहला गंभीर प्रयास है और इसकी महत्वाकांक्षाएं शिपिंग लॉजिस्टिक्स से कहीं आगे तक फैली हुई हैं।"
विशेष रूप से, अगर यहां इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल बनता है, तो भारत को वह राजस्व मिलेगा जो अभी विदेश जा रहा है। इससे निर्यातकों के लिए समय भी बचेगा और भारत की वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
सरकार के अनुमानों के अनुसार, 2040 तक इस प्रोजेक्ट से हर साल लगभग 3.16 अरब डॉलर की कमाई हो सकती है, जबकि कुल लागत 7.90 से 8.53 अरब डॉलर के बीच है।
इसके अलावा, 50,000 नौकरियों का अनुमान एक लक्ष्य है, गारंटी नहीं। लेकिन इस प्रोजेक्ट के पीछे जो आर्थिक सोच है, वह काफी मजबूत है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि "भारत की 'मैरिटाइम इंडिया विजन 2030' और 'सागरमाला कार्यक्रम' दोनों में पोर्ट-आधारित विकास को प्राथमिकता दी गई है। ग्रेट निकोबार वह जगह है जहां यह लक्ष्य असली भौगोलिक फायदा बन सकता है।"
--आईएएनएस
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