ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से बढ़ेगी भारत की समुद्री ताकत, चीन को मिलेगा रणनीतिक जवाब: राजीव चौधरी

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से बढ़ेगी भारत की समुद्री ताकत, चीन को मिलेगा रणनीतिक जवाब: राजीव चौधरी

पुणे, 1 मई (आईएएनएस)। लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) राजीव चौधरी ने 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' का समर्थन करते हुए कहा कि इससे चीन के मुकाबले भारत की रणनीतिक बढ़त बढ़ेगी, समुद्री नियंत्रण मजबूत होगा और आर्थिक विकास को गति मिलेगी।

सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के पूर्व महानिदेशक, लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) राजीव चौधरी ने कहा कि हम सभी मध्य पूर्व में चल रहे उस संघर्ष पर नजर रखे हुए हैं जिसमें अमेरिका, ईरान और इजराइल शामिल हैं और जहां होर्मुज जलडमरूमध्य विवाद का एक अहम केंद्र बनकर उभरा है।

इसी तरह, ग्रेट निकोबार द्वीप के पास स्थित मलक्का जलडमरूमध्य, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक रणनीतिक केंद्र के तौर पर काम कर सकता है। दुनिया का लगभग एक-तिहाई व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है और चीन की लगभग 60 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति भी इसी रास्ते से होती है। चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति पर काम कर रहा है, जिसमें ग्वादर बंदरगाह, हंबनटोटा बंदरगाह, चटगांव बंदरगाह और क्यौकप्यू जैसे अहम बंदरगाह शामिल हैं। ये बंदरगाह भारत के रणनीतिक हितों के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं। अगर भारत ग्रेट निकोबार में एक एकीकृत बंदरगाह सुविधा विकसित करता है, तो यह चीन की समुद्री रणनीति के मुकाबले एक मजबूत जवाब बन सकता है और इस क्षेत्र में भारत की स्थिति को और मजबूत कर सकता है।

राजीव चौधरी कहते हैं कि यह भारत को बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के मिलन बिंदु पर एक फॉरवर्ड लॉजिस्टिक्स बेस देगा, जिससे मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरने वाले समुद्री व्यापार पर बेहतर नियंत्रण हो सकेगा। भविष्य में होने वाले किसी भी संघर्ष की स्थिति में यह एक फोर्स प्रोजेक्शन बेस के तौर पर भी काम कर सकता है।

फिलहाल अंडमान और निकोबार कमांड पोर्ट ब्लेयर में केंद्रित है और द्वीप समूह के अन्य हिस्सों में इसकी मौजूदगी सीमित है। ग्रेट निकोबार द्वीप को एक रणनीतिक और लॉजिस्टिक्स हब के तौर पर विकसित करने से इस पूरे क्षेत्र में, जिसमें सिक्स डिग्री चैनल भी शामिल है, समुद्री निगरानी और बेहतर हो जाएगी। इस बंदरगाह से हर साल 16 मिलियन टीईयू तक के कार्गो को संभालने की उम्मीद है, जिससे यह भारत के लिए एक प्रमुख रणनीतिक और आर्थिक केंद्र बन जाएगा।

राजीव चौधरी ने कहा कि ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट, मलक्का जलडमरूमध्य से अपनी नजदीकी-लगभग 150 किलोमीटर के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य जितना ही रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन सकता है। दुनिया का लगभग 30 प्रतिशत व्यापार और चीन की 60 प्रतिशत ऊर्जा आपूर्ति मलक्का से होकर गुजरती है, जो इसके महत्व को रेखांकित करता है। ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट पोर्ट एक 'जीरो डेविएशन पोर्ट' के रूप में काम करेगा, जिससे जहाज बिना रास्ता बदले वहां रुक सकेंगे।

फिलहाल भारत कोलंबो पोर्ट, पोर्ट क्लांग और सिंगापुर जैसे बंदरगाहों पर बहुत ज्‍यादा निर्भर है, जिससे राजस्व का नुकसान होता है। ग्रेट निकोबार में लगभग 16 मिलियन टीईयू की प्रस्तावित क्षमता का उद्देश्य इस निर्भरता को कम करना है। इसके अलावा, इससे शिपमेंट में होने वाली 3–7 दिनों की देरी कम होगी और लॉजिस्टिक्स की लागत भी घटेगी, जिससे भारत की वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार होगा। यह प्रोजेक्ट जहाजों की मरम्मत और भंडारण की सुविधा भी देगा। साथ ही वहां रुकने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों से राजस्व भी अर्जित करेगा, जिससे यह एक रणनीतिक और आर्थिक, दोनों तरह की संपत्ति बन जाएगा।

चौधरी ने ग्रेट निकोबार के संबंध में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की टिप्पणियों पर कहा कि मेरी समझ से यह बयान काफी हद तक राजनीतिक लगता है और इसका कोई ठोस आधार नहीं है। इसकी मुख्य वजह यह है कि इस परियोजना के बारे में लोगों में जागरूकता काफी कम है। जब लोग इस परियोजना के दायरे और इसके लाभों को पूरी तरह से समझ जाएंगे, तो शायद इस तरह की टिप्पणियां सामने नहीं आएंगी। असल में, इस परियोजना में काफी देरी हुई है और इसे बहुत पहले ही शुरू कर दिया जाना चाहिए था, विशेष रूप से पिछले दो दशकों में चीन की समुद्री रणनीति जैसे घटनाक्रमों को देखते हुए। अब, भारत हिंद महासागर में अपने हितों की रक्षा के लिए एक रणनीतिक और आर्थिक केंद्र स्थापित करने की दिशा में एक आवश्यक कदम उठा रहा है।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का विरोध किए जाने पर राजीव चौधरी कहते हैं कि अगर विरोध की वजह से प्रोजेक्ट में देरी होती है, खासकर पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं का हवाला देकर डाले गए अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण तो इसका फायदा चीन को मिल सकता है। बीजिंग ग्रेट निकोबार द्वीप पर ऐसे किसी प्रोजेक्ट को लेकर आशंकित है, क्योंकि इससे इस क्षेत्र में समुद्री व्यापार और सैन्य गतिविधियों पर भारत की निगरानी और ज्‍यादा बढ़ जाएगी।

चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति—जिसमें ग्वादर पोर्ट, हंबनटोटा पोर्ट और क्यौकप्यू पोर्ट जैसे बंदरगाह शामिल हैं-का मुकाबला कैंपबेल-बे और गैलाथिया-बे में बनने वाले एक मजबूत रणनीतिक और आर्थिक केंद्र के जरिए किया जाएगा। इस तरह का विरोध या नकारात्मक बातें, अनजाने में ही सही, चीन के हितों के पक्ष में जा सकती हैं। यह एक बेहद जरूरी प्रोजेक्ट है, जिसे आदर्श रूप से तो बहुत पहले ही लागू कर दिया जाना चाहिए था।

चौधरी कहते हैं कि मेरी राय में एक फौजी होने के नाते ऐसा नहीं होना चाहिए। हालांकि एक लोकतंत्र में लोगों को अपनी राय जाहिर करने का अधिकार होता है, लेकिन जब बात ग्रेट निकोबार पहल या सीमा पर बुनियादी ढांचे जैसी रणनीतिक परियोजनाओं की आती है, खासकर समुद्री क्षेत्रों में तो उन्हें टालने या उनमें रुकावट डालने की कोई कोशिश नहीं होनी चाहिए। ऐसी परियोजनाएं भारत को चीन जैसे देशों के खिलाफ रणनीतिक बढ़त देती हैं और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए बेहद जरूरी हैं। इन पहलों को उचित प्रक्रिया से गुजारा जाता है और इन्हें इसलिए शुरू किया जाता है, क्योंकि ये संप्रभुता और सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। ‘राष्ट्र सबसे पहले’ वाला नजरिया होना चाहिए। राजनीतिक विरोध रणनीतिक और आर्थिक हितों की कीमत पर नहीं होना चाहिए, खासकर तब जब समुद्री व्यापार और सुरक्षा पर असर पड़ सकता हो।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से स्थानीय निवासियों को होने वाले फायदों के बारे में राजीव चौधरी कहते हैं कि हर नागरिक को देश की तरक्की का फायदा पाने का हक है। ग्रेट निकोबार द्वीप जैसे दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोग लंबे समय से विकास से वंचित रहे हैं, लेकिन इस प्रोजेक्ट का मकसद इस स्थिति को बदलना है। इससे बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, कनेक्टिविटी और कुल मिलाकर इंफ्रास्ट्रक्चर मिलेगा, जिससे स्थानीय लोगों को मुख्यधारा से जुड़ने में मदद मिलेगी। आर्थिक विकास और बड़े पैमाने पर विकास के साथ-साथ नए अवसर भी पैदा होंगे। उदाहरण के लिए, दस लाख टीईयू को संभालने के लिए 3,000–5,000 लोगों की जरूरत होती है, जबकि वहां की मौजूदा आबादी बहुत कम है। इसलिए इस इलाके में होने वाले किसी भी विकास से लोगों के रहन-सहन का स्तर काफी बेहतर होगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और जागरूकता बढ़ेगी, जिससे आखिरकार स्थानीय आबादी के जीवन की गुणवत्ता बेहतर होगी।

--आईएएनएस

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