नई दिल्ली, 16 अप्रैल (आईएएनएस)। लोकसभा में महिला आरक्षण पर बहस के दौरान बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने केंद्र सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन है, लेकिन इसकी प्रक्रिया लोकतांत्रिक मानकों के अनुरूप नहीं रही।
उन्होंने कहा कि इस बिल की प्रतियां सांसदों को सत्र शुरू होने से केवल दो दिन पहले ही दी गईं, न तो किसी विशेषज्ञ समिति से इस पर चर्चा कराई गई और न ही राज्यों से कोई परामर्श लिया गया।
उन्होंने सवाल उठाया कि बिना व्यापक विमर्श के सीधे बिल लाना क्या लोकतंत्र की सही परिभाषा है?
अपने संबोधन में पप्पू यादव ने महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आजाद भारत में महिलाओं की पूजा तो हुई, लेकिन उन्हें वास्तविक सम्मान कभी नहीं मिला। सती प्रथा, विधवा प्रथा, भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, खिलाड़ियों का शोषण और घरेलू हिंसा, ये सब आज भी समाज में मौजूद हैं। अहिल्या और कौशल्या तक का सम्मान नहीं हुआ। मनुस्मृति की सोच रखने वाले लोगों ने सावित्रीबाई फुले का घर तक जला दिया। जो लोग आज महिलाओं की बात करते हैं, उन्होंने कभी महिलाओं की शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आजादी का समर्थन नहीं किया।
पप्पू यादव ने आरोप लगाया कि देश को लगभग 100 उद्योगपति, 100 मीडिया मालिक, 100 धार्मिक ट्रस्टी और बाबा चलाते हैं, लेकिन इनमें एक भी दलित, एसटी, ओबीसी या ईबीसी वर्ग का प्रतिनिधि नहीं है। ऐसे में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व कौन करेगा? क्या कभी गरीब और ग्रामीण महिलाओं की बात होगी?
उन्होंने दावा किया कि 755 सांसदों पर यौन शोषण के आरोप हैं और 155 पर चार्जशीट दाखिल हैं। उन्होंने कहा कि देश में यौन शोषण के आरोप सबसे ज्यादा नेताओं, फिर बाबाओं और अधिकारियों पर लगते हैं, जबकि हम महिलाओं के अधिकार की बात करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि 80 प्रतिशत से अधिक यौन शोषण के मामले दर्ज ही नहीं होते।
उन्होंने हाल की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि नोएडा में बेटियों के साथ अत्याचार हुआ, मणिपुर देश के लोकतंत्र पर काला धब्बा है और देश को गौरवान्वित करने वाली सोफिया कुरैशी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया। महिला आरक्षण बिल के खिलाफ कोई नहीं है, लेकिन इसे लाने के तरीके पर सवाल हैं।
उन्होंने सोनिया गांधी और राजीव गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने गंभीरता से इस बिल को लाने की कोशिश की थी और भाजपा का भी समर्थन किया था।
उन्होंने सवाल उठाया कि सिर्फ तीन दिन का विशेष सत्र बुलाने की क्या जरूरत थी? साथ ही जनसंख्या और परिसीमन जैसे मुद्दों को इससे जोड़ने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पहले जातीय जनगणना कराई जाए, उसके बाद महिला आरक्षण लागू किया जाए। उन्होंने अपील की कि महिलाओं के सम्मान और अधिकार के लिए बिल जरूर लाया जाए, लेकिन इसे राजनीति का विषय न बनाया जाए और उत्तर-दक्षिण के आधार पर देश को बांटने की कोशिश न की जाए।
--आईएएनएस
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