मुंबई, 31 अगस्त (आईएएनएस)। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की लोकप्रियता को पूरी दुनिया में बढ़ाने में बॉलीवुड के खलनायकों ने भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई। उन्हीं विलेन में एक केएन. सिंह थे, जिनका पूरा नाम कृष्ण निरंजन सिंह था। वह भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के प्रसिद्ध और दिग्गज खलनायकों के साथ ही चरित्र अभिनेताओं में से एक थे।
के. एन. सिंह एक ऐसे चरित्र कलाकार थे, जो पर्दे पर चीखे-चिल्लाए बिना अपने नेगेटिव किरदार को दमदार तरीके से दर्शाने के लिए जाने जाते थे। उनका जन्म 1 सितंबर 1908 को उत्तराखंड के देहरादून में एक पढ़े-लिखे और संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता चंडी प्रसाद सिंह एक प्रसिद्ध क्रिमिनल लॉयर और कुछ रियासतों के राजा थे। के. एन. सिंह भी अपने पिता की तरह ही कानून की पढ़ाई कर बैरिस्टर बनना चाहते थे, लेकिन अपने पिता द्वारा एक कातिल को कानून से बचाए जाने की घटना ने उनके अंदर इस पेशे के प्रति पनपे जुनून को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
के. एन. सिंह के पिता चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई खत्म करके जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा हो जाए। इसके लिए के. एन. सिंह ने कई काम किए, जिसमें लाहौर जाकर प्रिंटिंग प्रेस स्थापित करना, राजा-रजवाड़ों को पालने के लिए जंगली जानवर सप्लाई करना, चाय बागान में काम करने वालों के लिए खास प्रकार के जूते बनवाना, फौज में खुखरी की सप्लाई करना, आदि शामिल थे। यह सभी धंधे शुरुआत में सफल रहे, लेकिन आगे चलकर कुछ ज्यादा फल-फूल नहीं पाए।
के. एन. सिंह के जीवन में एक समय ऐसा आया कि पिता उनके भविष्य को लेकर चिंतित रहने लगे और खुद उनका भी आत्मविश्वास लगातार मिल रही असफलताओं से डगमगाने लगा था। इसके बाद उनके पिता ने उनकी शादी 1930 में मेरठ के फौलादा गांव की आनंद देवी से कर दी। हालांकि, उनकी कुछ समय बाद बीमारी के कारण मौत हो गई।
के. एन. सिंह एक बेहतरीन अभिनेता के साथ एथलीट भी थे। वह 1935 के बर्लिन ओलंपिक के लिए उनका चयन लगभग तय था, लेकिन बहन की बीमारी के कारण वे उसमें भाग नहीं ले सके। उस समय उन्हें बीमार बहन को देखने के लिए कलकत्ता जाना पड़ा और तभी उनकी मुलाकात पृथ्वीराज कपूर से हुई, जिन्होंने उनकी मुलाकात निर्देशक देबाकी बोस से करवाई।
के. एन. सिंह को स्क्रीन पर खलनायकी के लिए 'जेंटलमैन विलेन' के रूप में जाना जाता था। उन्होंने अपनी एक्टिंग करियर की शुरुआत वर्ष 1936 में आई फिल्म 'सुनहरा संसार' से की, जिसमें उन्होंने एक डॉक्टर का किरदार निभाया था। इसके बाद वह मुंबई आ गए और उन्होंने 1937 की सुपरहिट फिल्म 'बागवान' से बतौर खलनायक इंडस्ट्री में पहचान बनाई। अभिनय की दुनिया में मिली सफलता के बाद उन्होंने एक के बाद एक कई फिल्मों में बतौर खलनायक और चरित्र कलाकार काम किए।
के. एन. सिंह हिंदी सिनेमा के पहले ऐसे खलनायक माने जाते हैं, जो पर्दे पर बिना चीखे-चिल्लाए, केवल अपनी कातिलाना नजरों, गहरी आवाज और चेहरे के भावों से दर्शकों के दिलों में खौफ पैदा करने की कला रखते थे। अपने पांच दशक लंबे करियर में अभिनेता ने 200 से अधिक हिंदी फिल्मों में अभिनय किया। उनकी कुछ प्रमुख फिल्मों की बात करें तो उनमें 'बागबान' (1938), 'बरसात' (1949), 'आवारा' (1951), 'बाजी' (1951), 'जाल' (1952), 'सीआईडी' (1956), 'हावड़ा ब्रिज' (1958), 'चलती का नाम गाड़ी' (1958), 'तीसरी मंजिल' (1966), 'हाथी मेरे साथी' (1971), 'डॉन' (1978), आदि शामिल हैं। उनकी आखिरी फिल्म 'दानवीर' थी, जो 20 सितंबर 1996 को रिलीज हुई थी।
उनके व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो वह छह भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उनकी दूसरी पत्नी का नाम प्रवीण पाल था, जो खुद भी एक सफल चरित्र अभिनेत्री थीं। हालांकि, दोनों की कोई संतान नहीं थी। इसलिए उन दोनों ने अपने छोटे भाई विक्रम सिंह के बेटे पुष्कर सिंह को गोद लिया था, जो आगे चलकर टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माता बने। वहीं, अपने जीवन के अंतिम चरण में के. एन. सिंह को दिखाई देना बंद हो गया था। 31 जनवरी 2000 को मुंबई में उनका निधन हो गया।
--आईएएनएस
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