आदेशों से ऊपर देश, केएम करियप्पा ने साहस नहीं दिखाया होता तो लेह भारत से अलग हो सकता था

आदेशों से ऊपर देश, केएम करियप्पा ने साहस नहीं दिखाया होता तो लेह भारत से अलग हो सकता था

नई दिल्ली, 27 जनवरी (आईएएनएस)। भारत के सैन्य इतिहास में कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जो सिर्फ युद्ध नहीं, बल्कि देश की भौगोलिक किस्मत तय कर देते हैं। ऐसा ही एक ऐतिहासिक फैसला लिया था केएम करियप्पा ने, जिन्होंने 1948 में अद्भुत साहस और दूरदृष्टि का परिचय दिया था, तो आज शायद लेह भारत का हिस्सा नहीं होता।

28 जनवरी 1899 को कूर्ग की शांत पहाड़ियों में जन्मे केएम करियप्पा महान बनने के लिए ही पैदा हुए थे। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान नस्लीय बाधाओं को तोड़ते हुए वे ब्रिटिश भारतीय सेना में शामिल होने वाले पहले भारतीयों में से थे। वे रैंक में ऊपर चढ़ते गए। 15 जनवरी 1949 को इतिहास रचते हुए वे भारतीय सेना के पहले कमांडर-इन-चीफ बने, क्योंकि यह पद पहले सिर्फ अंग्रेजों के लिए था। 1947-48 के जम्मू-कश्मीर ऑपरेशन्स के दौरान उनका नेतृत्व भारत के लिए इस क्षेत्र को सुरक्षित करने में महत्वपूर्ण था।

उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करते हैं, जिन्होंने भारतीय सेना को सिखाया कि मिलिट्री इंटेलिजेंस को युद्ध के मैदान में फायदे में कैसे बदला जाए। लेह जाने वाली सड़क तब तक नहीं खोली जा सकती थी, जब तक भारतीय सेना का जोजिला, द्रास और कारगिल पर कब्जा नहीं हो जाता। ऊपर के आदेशों की अवहेलना करते हुए करियप्पा ने वही किया।

उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जिसकी दुनिया में कोई मिसाल नहीं थी। अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो आज लेह भारत का हिस्सा नहीं बना होता। उनकी बनाई गई योजना के तहत भारतीय सेना ने पहले नौशेरा और झंगर पर कब्जा किया, फिर जोजिला-द्रास और कारगिल से भी हमलावरों को पीछे धकेल दिया।

भारत-पाक विभाजन के तुरंत बाद शुरू हुआ 1947-48 का भारत-पाक युद्ध भारत के लिए सबसे बड़ी सैन्य परीक्षा था। पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों ने जोजिला दर्रे पर कब्जा कर लिया था। यह दर्रा कश्मीर घाटी और लद्दाख के बीच एकमात्र जीवनरेखा था। इसके हाथ से निकलते ही लेह पूरी तरह कट जाता और भारत की क्षेत्रीय अखंडता को गहरी चोट लगती।

करीब 11,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित जोजिला दर्रा बर्फीले तूफानों, ऑक्सीजन की कमी और बेहद संकरे रास्तों के लिए जाना जाता है। यहां लड़ना नामुमकिन माना जाता था। न तो भारी हथियार चल सकते थे और न ही वाहन। पहले किया गया पैदल सेना का हमला भी असफल हो चुका था। हालात इतने खराब थे कि सैन्य नेतृत्व में भी निराशा फैलने लगी थी।

करियप्पा ने हार मानने से इनकार कर दिया। भारतीय सेना ने जोजिला पर फिर से कब्जा करने के लिए एक साहसी हमला किया, जो ऑपरेशन में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इस हमले को और भी खास बात यह बनाती है कि इसमें टैंकों का अचानक इस्तेमाल किया गया, जिससे यह दुनिया भर में सबसे अधिक ऊंचाई पर किया गया पहला ऐसा युद्ध बन गया, जिसमें बख्तरबंद इकाइयों ने हिस्सा लिया था।

कब्जा करने का शुरुआती हमला 77वीं पैराशूट ब्रिगेड ने किया था, जिसका नेतृत्व ब्रिगेडियर अटल कर रहे थे। मूल रूप से 'ऑपरेशन डक' नाम के इस हमले का नाम बाद में करियप्पा ने बदलकर 'ऑपरेशन बाइसन' कर दिया। अचानक हुए इस हमले से पाकिस्तानी सेनाएं हैरान रह गईं। इधर, अपने अभियान में आगे बढ़ते हुए भारतीय फौज ने दुश्मनों को द्रास तक पीछे धकेल दिया। फिर ब्रिगेड 24 नवंबर को लेह से आगे बढ़ रही भारतीय सेना से जुड़ गई।

करियप्पा के साहसिक कदमों के बाद 'ऑपरेशन बाइसन' की सफलता ने न सिर्फ महत्वपूर्ण क्षेत्र पर फिर से कब्जा किया, बल्कि भारतीय सेना की सरलता और बहादुरी को भी दिखाया, जिससे ऊंचाई पर प्रभावी ढंग से काम करने की उनकी क्षमता का पता चला। इस ऑपरेशन की विरासत भारतीय सैन्य कर्मियों की आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है।

--आईएएनएस

डीसीएच/एबीएम