यादों में पीसी वैद्य : गणित को आसान बनाने वाले वैज्ञानिक, दुनिया को दिया 'वैद्य मीट्रिक'

यादों में पीसी वैद्य : गणित को आसान बनाने वाले वैज्ञानिक, दुनिया को दिया 'वैद्य मीट्रिक'

नई दिल्ली, 22 मई (आईएएनएस)। 23 मई 1918 को गुजरात के जूनागढ़ जिले के एक छोटे से गांव शाहपुर में जन्मे प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य बहुत ही कम उम्र में माता-पिता का साया सिर से उठ गया। साल 1931 में जब वह केवल नौवीं कक्षा में थे, तब उनके पिता का देहांत हो गया।

विपरीत परिस्थितियों और आर्थिक तंगियों से जूझते हुए उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और मुंबई के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से गणित और भौतिकी में प्रथम श्रेणी के साथ स्नातक व स्नातकोत्तर (एमएससी) की उपाधि प्राप्त की।

​वर्ष 1937 में बॉम्बे विश्वविद्यालय में प्रख्यात भौतिकशास्त्री प्रोफेसर विष्णु वासुदेव नार्लीकर (महान खगोलशास्त्री जयंत नार्लीकर के पिता) के व्याख्यान ने युवा प्रहलाद के मन में कौतूहल पैदा कर दिया। आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत में एक बड़ी कमी थी। तत्कालीन समय में किसी स्थिर पिंड के गुरुत्वाकर्षण को तो मापा जा सकता था, लेकिन लगातार प्रकाश और ऊर्जा का विकिरण करने वाले चमकते हुए तारे के बाहरी गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को गणितीय रूप से परिभाषित करना असंभव माना जाता था।

​1942 में जब देश में 'भारत छोड़ो आंदोलन' की आंधी चल रही थी और महात्मा गांधी जेल में 21 दिनों के उपवास पर थे, तब वैद्य अपनी ऐतिहासिक 'काशी यात्रा' (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) पर थे। देश में भारी तनाव था, लेकिन इसी अशांत वातावरण के बीच 24 वर्षीय वैद्य के दिमाग में दिक्-काल ज्यामिति का एक अद्भुत विचार आया। उन्होंने सोचा कि चूंकि तारा लगातार प्रकाश का उत्सर्जन कर रहा है, इसलिए उसके आसपास के क्षेत्र को निर्वात नहीं माना जा सकता। वहां प्रकाश की गति से चलने वाले कण मौजूद होते हैं। इस भौतिक सत्य को आधार बनाकर उन्होंने केवल एक सप्ताह के भीतर उस गणितीय समीकरण को हल कर लिया जिसे दुनिया आज 'वैद्य मीट्रिक' कहती है।

प्रोफेसर पीसी वैद्य केवल बंद कमरों में अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक नहीं थे। वे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआईएफआर) में होमी जहांगीर भाभा के साथ जुड़े, लेकिन मुंबई की भीड़भाड़ से दूर उन्होंने गुजरात के ग्रामीण अंचल वल्लभ विद्यानगर में पढ़ाना पसंद किया।

वह बाद में गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति बने। कुलपति के रूप में उनकी सादगी की कई कहानियां आज भी दोहराई जाती हैं। वे कभी भी सरकारी कार का उपयोग अपने निजी काम के लिए नहीं करते थे। जिस दिन वे कुलपति के पद से सेवानिवृत्त हुए, वे दफ्तर की चाबी सौंपकर अपनी पुरानी साइकिल पर सवार होकर अपने घर लौट गए। उनके कार्यालय में हमेशा एक बड़ा ब्लैकबोर्ड टंगा रहता था, ताकि कोई भी छात्र या शोधकर्ता सीधे आकर उनके साथ गणितीय समीकरणों पर चर्चा कर सके।

प्रोफेसर वैद्य का मानना था कि विज्ञान और गणित का लाभ केवल विश्वविद्यालय के कमरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे बच्चे तक पहुंचना चाहिए। इस विचार के साथ उन्होंने गुजरात गणित मंडल (1963) की स्थापना की, जिसके सम्मेलन गुजरात के सबसे पिछड़े ग्रामीण इलाकों में आयोजित किए जाते थे ताकि प्राथमिक शिक्षकों को आधुनिक गणित का आसान प्रशिक्षण मिल सके।

गुजराती भाषा में गणित की 'सुगणितम्' त्रैमासिक पत्रिका की शुरुआत की, जो आज भी सफलतापूर्वक प्रकाशित हो रही है और बच्चों के मन से गणित का डर दूर कर रही है।

वे आजीवन गांधीवादी मूल्यों पर चले। उन्होंने बड़े महानगरों के चमक-दमक वाले रिसर्च सेंटरों की जगह गुजरात के स्थानीय कॉलेजों को अपनी कर्मभूमि चुना। पीसी वैद्य को श्रीनिवास रामानुजन स्वर्ण पदक से सम्मानित किया।

12 मार्च 2010 को वे इस दुनिया को छोड़ चले।

--आईएएनएस

वीकेयू/डीएससी