यादों में गोखले : 'प्रोफेसर' के आंकड़ों से डरता था ब्रिटिश वायसराय, शिष्य को बनाया 'महात्मा'

यादों में गोखले: वे 'प्रोफेसर' जिनके आंकड़ों से डरता था ब्रिटिश वायसराय, शिष्य को बनाया 'महात्मा'

नई दिल्ली, 18 फरवरी (आईएएनएस)। जब युवा गांधी जी भारत आए, तो उनमें उत्साह तो था, लेकिन भारत की जमीनी हकीकत की समझ कम थी। यह गोपाल कृष्ण गोखले ही थे, जिन्होंने गांधी जी को वह मंत्र दिया, जिसने आगे चलकर अंग्रेजों की नींव हिला दी।

उन्होंने गांधी जी से कहा, "अगले एक साल तक अपनी आंखें खुली रखो, लेकिन मुंह बंद।" गोखले जानते थे कि गांधी जी को 'महात्मा' बनने के लिए पहले भारत को समझना होगा। अगर गोखले न होते, तो शायद हमें वह गांधी जी कभी न मिलते, जिन्हें आज दुनिया पूजती है।

गोपाल कृष्ण गोखले का जन्म 9 मई 1866 को रत्नागिरी में हुआ था। मौजूदा समय में यह महाराष्ट्र में पड़ता है। गोखले गणित के प्रोफेसर थे और उनकी राजनीति भी गणित की तरह सटीक थी। जब वे इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में खड़े होते थे, तो उनके हाथ में तलवार नहीं, बल्कि आंकड़ों यानी डेटा की शीट होती थी।

कहा जाता है कि जब गोपाल कृष्ण गोखले बजट पर बोलने के लिए खड़े होते थे, तो तत्कालीन वायसराय और ब्रिटिश अधिकारी अपनी कुर्सियों पर असहज हो जाते थे। लॉर्ड कर्जन जैसा अहंकारी शासक भी उनकी तार्किक क्षमता का लोहा मानता था। गोखले ने ही पहली बार अंग्रेजों को यह आईना दिखाया कि कैसे नमक पर लगाया गया कर (सॉल्ट टैक्स) भारत के गरीब की थाली से स्वाद ही नहीं, बल्कि जीवन छीन रहा है।

उन्होंने सेना पर होने वाले बेहिसाब खर्च का विरोध किया और मांग की कि वह पैसा भारतीय बच्चों की शिक्षा पर खर्च होना चाहिए।

गोपाल कृष्ण गोखले का मानना था कि राजनीति कोई 'पार्ट-टाइम जॉब' नहीं है, बल्कि यह एक तपस्या है। इसी सोच के साथ उन्होंने 1905 में 'सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी' की नींव रखी। यह कोई राजनीतिक दल नहीं था, बल्कि देशभक्तों का एक मठ था।

इसमें शामिल होने वाले युवाओं को सात कठिन प्रतिज्ञाएं लेनी पड़ती थीं। उन्हें कसम खानी होती थी कि वे जीवन भर गरीबी में रहेंगे, केवल देश के लिए सोचेंगे और अपने परिवार के लिए कोई धन नहीं जोड़ेंगे। गोखले ने एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जो सुर्खियों में रहने के बजाय समाज की नींव बनने में विश्वास रखती थी।

आज के दौर में यह विश्वास करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन एक समय था जब मोहम्मद अली जिन्ना (जो बाद में पाकिस्तान के निर्माता बने) गोखले के सबसे बड़े प्रशंसक थे। गोखले हिंदू-मुस्लिम एकता के इतने बड़े पक्षधर थे कि जिन्ना ने सार्वजनिक रूप से कहा था, "मेरी बस एक ही महत्वाकांक्षा है, मुस्लिम गोखले बनना।" गोखले ने जिन्ना को "हिंदू-मुस्लिम एकता का सबसे अच्छा राजदूत" भी कहा था।

गोखले ने अपने अंतिम दिनों में कांग्रेस के गरम दल (तिलक गुट) और नरम दल को एक करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। सरोजिनी नायडू ने उन्हें "हिंदू-मुस्लिम एकता का महानतम राजदूत" कहा था। यह उनकी शख्सियत का जादू था कि उनके धुर विरोधी बाल गंगाधर तिलक ने भी उनकी मृत्यु पर 'केसरी' में लिखा था कि भारत ने अपना 'हीरा' खो दिया है।

गोखले ने भारत के लिए स्वशासन का एक खाका तैयार किया, जिसे 'गोखले का राजनीतिक वसीयतनामा' कहा जाता है। इसमें उन्होंने भविष्य के भारत की तस्वीर उकेरी थी, जहां भारतीयों को अपनी सरकार चलाने का हक हो। यही दस्तावेज 1919 के सुधारों और बाद के संविधान निर्माण की नींव बना।

इतिहास कभी-कभी बड़ी खामोशी से अपने पन्ने पलटता है। 1915 का साल इसका सबसे बड़ा गवाह है। नियति देखिए, जनवरी 1915 में मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका से हमेशा के लिए भारत लौटे और ठीक एक महीने बाद 15 फरवरी को उनके राजनीतिक गुरु गोखले ने दुनिया छोड़ दिया।

--आईएएनएस

वीकेयू/एबीएम