'विक्ट्री डे' पर रूसी दूतावास ने इम्मोर्टल रेजिमेंट निकाला, एंबेसी उपप्रमुख बोले- देश के हीरो के लिए रैली

'विक्ट्री डे' पर रूसी दूतावास ने इम्मोर्टल रेजिमेंट निकाला, एंबेसी उपप्रमुख बोले- देश के हीरो के लिए रैली

नई दिल्ली, 8 मई (आईएएनएस)। रूस में 9 मई को विक्ट्री डे का जश्न मनाया जाएगा। इस मौके पर देश में बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है। विक्ट्री डे के मौके पर रूस ने यूक्रेन के साथ सीजफायर का ऐलान किया। हालांकि, कुछ ही समय बाद यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने सीजफायर के उल्लंघन की जानकारी दी। इस बीच भारत में रूस के दूतावास ने दूसरे विश्व युद्ध में जीत की 81वीं सालगिरह मनाई।

न्यूज एजेंसी आईएएनएस के साथ बातचीत के दौरान, रूसी दूतावास के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन रोमन बाबुश्किन ने कहा, "विक्ट्री डे 9 मई को है। आज हम एक बहुत जरूरी रैली कर रहे हैं जिसे इम्मोर्टल रेजिमेंट कहा जाता है। यह रैली उन हीरो को समर्पित है जो उस युद्ध में लड़े और दुनिया को जीत दिलाई, जिन्होंने रूस और पूरी दुनिया को नाजीवाद के खतरे से आजाद कराया। इस जीत में सोवियत यूनियन का सबसे बड़ा योगदान रहा है, जिसने 27 बिलियन जानें गंवाईं और यह रैली उन हीरो की याद में है जिन्होंने यह जीत दिलाई। यह संयुक्त पवित्र परंपरा है। हम रूसी सेना को याद कर रहे हैं, जो एक साथ उस युद्ध में लड़े।"

सिविल सोसायटी के सदस्य दलजीत सिंह भी रूसी दूतावास की ओर से आयोजित इस विक्ट्री डे कार्यक्रम में शामिल हुए। उन्होंने कहा, "आज का दिन बहुत खास है। यह वह दिन है जब हम महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध में जीत का जश्न मनाते हैं। हम इसे ‘ग्रेट पैट्रियॉटिक वॉर’ कहते हैं। यह युद्ध 1941 से 1945 तक नाजियों के खिलाफ लड़ा गया था। यह सोवियत संघ की मजबूत राष्ट्रीय पहचान, उसकी एकजुटता और युद्ध लड़ने के राष्ट्रीय संकल्प को दर्शाता है। सोवियत संघ ने इस युद्ध में बहुत बड़ी कीमत चुकाई थी। करीब 2 करोड़ 60 लाख लोग मारे गए थे। इसके अलावा, युद्ध के दौरान सोवियत संघ ने अपनी लगभग एक-तिहाई राष्ट्रीय संपत्ति भी खो दी थी।"

उन्होंने आगे कहा कि रूस ने लगभग 70,000 गांव और 1,700 शहर खो दिए। और उन्होंने ऐसा क्यों किया? इंसानियत को नाजी आंदोलन के चंगुल से बचाने के लिए। नाजियों ने, आपको याद होगा, उन चार से पांच सालों में दुनिया का ज्यादातर हिस्सा तबाह कर दिया था। यह इस कीमत, इस कुर्बानी, बहुत ज्यादा कुर्बानी की वजह से हुआ। हमें इस कुर्बानी को मानना ​​चाहिए क्योंकि यह कुर्बानी उस समय सोवियत संघ की किसी एक जरूरत के लिए नहीं की गई थी।

दलजीत सिंह ने कहा, "यह दुनिया में शांति, आजादी, स्थिरता और मेलजोल सुनिश्चित करने के लिए था। क्योंकि यह इतिहास में एक टर्निंग पॉइंट था। जब यह युद्ध जीता गया तो यह दुनिया के इतिहास की नींव का पत्थर था। और आखिरकार दुनिया नाजी आंदोलन और नाजियों के चंगुल से आजाद हो गई। नाजियों ने जो भी जुल्म, नरसंहार और सारी बर्बरता फैलाई थी। तो यह असल में फासिज्म के खिलाफ एक युद्ध था।"

--आईएएनएस

केके/एएस