नई दिल्ली, 2 जनवरी (आईएएनएस)। सृष्टि के कण-कण में बसे भगवान शिव का न कोई मूल आकार है और न ही रूप। भक्त अपने मनचाहे रूप में भगवान शिव की आराधना कर सकते हैं।
हमारे देश के अलग-अलग मंदिरों में मौजूद शिवलिंग स्वयं इस बात की गवाही देते हैं। ऐसा ही एक मंदिर वाराणसी में स्थित है, जो हर साल तिल बराबर बढ़ता है। मान्यता है कि हर साल शिवलिंग के आकार में परिवर्तन देखा जाता है।
काशी विश्वनाथ मंदिर से 2 किलोमीटर दूर पांडे हवेली की गली में भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित बाबा तिलभांडेश्वर महादेव का मंदिर है। मंदिर के नाम से साफ है कि बाबा का संबंध तिल से है और कोई भी इच्छा पूरी होने पर बाबा को तिल अर्पित किए जाते हैं। यहां का शिवलिंग बाकी मंदिरों से काफी अलग है। शिवलिंग का आकार किसी गुंबद की तरह है और इस पर बड़ी सी गोल आकृति भी बनी है।
माना जाता है कि भगवान शिव बाबा तिलभांडेश्वर के रूप में भक्तों को सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। मंदिर 2,500 वर्ष पुराना है और इसका अस्तित्व सतयुग से है। कहा जाता है कि पहले शिवलिंग सामान्य आकार का हुआ करता था, लेकिन द्वापर युग तक शिवलिंग का आकार बढ़ता गया।
कलयुग में प्रवेश के साथ भक्तों ने बाबा के बढ़ते रूप को लेकर चिंता व्यक्त की और उनसे प्रार्थना की कि वे अपना आकार स्थिर कर लें। भक्तों की प्रार्थना को बाबा ने स्वीकार किया और साल में एक बार, सिर्फ मकर संक्रांति पर तिलभर बढ़ने का वचन दिया। उस समय से लेकर अब तक बाबा साल में एक बार अपना आकार बदलते हैं।
मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग 3.5 फीट का है, जबकि उसका व्यास 3 फीट है। मंदिर के इतिहास को मां शारदा से जोड़कर भी देखा गया है। माना जाता है कि इस मंदिर में मां शारदा ने तपस्या की थी और भगवान शिव को प्रसन्न कर वरदान पाया था।
काशी को दो भागों में विभाजित माना जाता है, जिसमें एक है काशी खंड और दूसरी है केदार खंड। बाबा तिलभांडेश्वर महादेव का मंदिर केदारखंड में स्थित है। बाबा विश्वनाथ और महामृत्युंजय काशी खंड के स्वामी हैं। तिलभांडेश्वर, केदारेश्वर और कई अन्य महत्वपूर्ण शिवालय केदार खंड में स्थित हैं।
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