नई दिल्ली, 10 मार्च (आईएएनएस)। भारतीय इतिहास के पन्नों को जब भी पलटा जाएगा, तब वीरता-संघर्ष, स्वराज्य के प्रतीक और स्वराज्य रक्षक कहलाने वाले वीर संभाजी महाराज का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा। भारतीय इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है।
छत्रपति संभाजी महाराज मराठा इतिहास के एक महान योद्धा, कुशल शासक और स्वराज्य के सच्चे रक्षक थे। वह छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र थे, जिन्होंने पिता की स्थापित हिंदवी स्वराज्य की विरासत को न केवल संभाला, बल्कि उसे और मजबूत बनाया। संभाजी महाराज ने अपने शासनकाल में मुगलों, पुर्तगालियों समेत अन्य शत्रुओं से निरंतर डटकर मुकाबला किया और मराठा साम्राज्य की रक्षा की, इसलिए उन्हें 'स्वराज्य रक्षक' की उपाधि भी मिली।
'स्वराज्य रक्षक' की 11 मार्च को पुण्यतिथि है, जब सन् 1689 में औरंगजेब की क्रूर यातनाओं के बावजूद वह टूटे नहीं और उन्होंने धर्म और स्वराज्य के लिए अपना बलिदान दे दिया। संभाजी महाराज का जन्म 14 मई 1657 को पुरंदर किले (वर्तमान पुणे) में हुआ था। उनकी मां साईबाई, शिवाजी की पहली पत्नी थीं। मात्र दो वर्ष की उम्र में मां का निधन हो गया, तो दादी जीजाबाई ने उनका पालन-पोषण किया। बचपन से ही वह वीर और बुद्धिमान थे। नौ वर्ष की उम्र में 1665 की पुरंदर संधि के तहत उन्हें मुगलों के पास राजनीतिक बंधक के रूप में भेजा गया, जहां आमेर के राजा जय सिंह प्रथम के साथ रहे। यह उनका पहला राजनीतिक अनुभव था।
शिवाजी एंड हिज टाइम्स किताब में इतिहासकार जदुनाथ सरकार लिखते हैं, शिवाजी की पहली पत्नी साईबाई से 14 मई 1657 को सबसे बड़े बेटे संभाजी का जन्म हुआ। जबकि दूसरी पत्नी का नाम सोयराबाई था, जिससे छोटे बेटे राजा राम का 24 फरवरी 1670 में जन्म हुआ। आगे चलकर इन्हीं दो बेटों को केंद्र में रखते हुए मराठा साम्राज्य में दो हिस्सों में बंट गए।
शिवाजी महाराज के निधन (1680) के बाद सिंहासन के लिए संघर्ष हुआ। शिवाजी की दूसरी पत्नी सोयराबाई अपने पुत्र राजाराम को सिंहासन पर बैठाना चाहती थीं। नौ महीने के संघर्ष के बाद, हम्बीरराव मोहिते जैसे सेनापतियों के समर्थन से 1681 में संभाजी का राज्याभिषेक हुआ, और वह छत्रपति बने।
अपने शासनकाल में संभाजी ने योग्य प्रशासकों की नियुक्ति की, आठ मंत्रियों की परिषद को मजबूत किया और मजबूत कानूनी व्यवस्था स्थापित की। उन्होंने सुशासन पर जोर दिया। प्रशासन के साथ ही उन्होंने सांस्कृतिक रूप से भी योगदान दिया। मराठी भाषा, कला, साहित्य और वास्तुकला को भी बढ़ावा दिया।
जानकारी के अनुसार, वह स्वयं संस्कृत के विद्वान थे और 'बुधभूषण', 'नायिकाभेद', 'सतशतक' जैसी रचनाएं कीं। उनके शासन का अधिकांश समय युद्धों में बीता। 1682 से 1688 तक औरंगजेब की विशाल सेना से दक्कन में कई मोर्चों पर लड़े। गुरिल्ला युद्ध की रणनीति, जिसमें अचानक हमला, घात लगाकर आक्रमण और तेजी से पीछे हटना शामिल है।
सन् 1687 में वाई का युद्ध हुआ, जहां सेनापति हम्बीरराव मोहिते मारे गए, जिससे मराठा का मनोबल प्रभावित हुआ। दिसंबर 1687 के बाद स्थिति बिगड़ती गई। 1 फरवरी 1689 को संगमेश्वर में शिरके कबीले के सदस्यों के धोखे से मुगल सेनापति मुकर्रब खान ने उन्हें बंदी बना लिया। कवि कलश सहित उन्हें औरंगजेब के पास ले जाया गया। औरंगजेब ने कई दिनों तक उन्हें क्रूर यातनाएं दीं, लेकिन वह नहीं झुके।
11 मार्च 1689 को तुलापुर (भीमा नदी तट, पुणे के पास) में उनका सिर कलम कर दिया गया। कई स्रोतों के अनुसार, उन्होंने यातनाओं में भी 'हर हर महादेव' और 'जय भवानी' का जयकारा लगाया था।
--आईएएनएस
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