नई दिल्ली, 31 जनवरी (आईएएनएस)। सुशीला देवी लिकमाबम जूडोका में भारत का वैश्विक मंचों पर प्रतिनिधित्व करने वाली बड़ा नाम हैं। सुशीला वैश्विक मंच पर पदक जीत देश का नाम रोशन कर चुकी हैं।
सुशीला लिकमाबाम का जन्म 1 फरवरी 1995 को मणिपुर की राजधानी इंफाल के हेइंगांग मायई लीकाई में हुआ था। सुशीला के चाचा लिकमबम दीनीत अंतरराष्ट्रीय जूडोका रहे हैं। उन्हीं के मार्गदर्शन में सुशीला ने जूडोका का प्रशिक्षण लेना शुरू किया था। जूडोका की ट्रेनिंग के लिए सुशीला को उनके 2002 में खुमान लैम्पक ले गए थे। मात्र 7 साल की उम्र में शुरू हुई उनकी यात्रा अभी भी जारी है।
2007 से 2010 तक उन्होंने मणिपुर स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में ट्रेनिंग की। 2010 से वह पटियाला में ट्रेनिंग कर रही थीं। सुशीला के लिए प्रशिक्षण का शुरुआती दौर मुश्किलों वाला था। उनके पिता निजी कंपनी में नौकरी करते हैं। कई बार किसी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए और शहर से बाहर जाने के लिए सुशीला के पास पैसे नहीं होते थे। उन्हें समुचित डाइट भी नहीं मिल पाती थी, लेकिन सुशीला ने बिना हिम्मत हारे अपना कठिन प्रशिक्षण जारी रखा। साई के हॉस्टल में पहुंचने और कई स्पॉन्सर के साथ ही भारत सरकार से स्कॉलरशिप मिलने के बाद उनकी परेशानियां दूर हुईं। इसके बाद वह पूरे मनोयोग से खेल में श्रेष्ठ बनने के लिए जुट गईं और अपनी मेहनत से देश के लिए कॉमनवेल्थ में पदक जीता।
सुशीला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान 2014 में मिली। इस साल ग्लासगो में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में 48 किग्रा भार वर्ग में उन्होंने रजत पदक जीता था। इसके बाद 2019 साउथ एशियन गेम्स में, उन्होंने महिलाओं के 48 किग्रा भार वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था। सुशीला हांगकांग एशिया ओपन 2018 और 2019 में रजत पदक जीत चुकी हैं।
लिकमाबम ने जूडो में भारत के लिए अकेली प्रतिनिधि के तौर पर 2020 समर ओलंपिक्स के लिए क्वालिफाई किया। हालांकि, 48 किग्रा में वह पहले ही राउंड में बाहर हो गई थीं।
सुशीला देवी ने 2022 कॉमनवेल्थ गेम्स में भी 48 किग्रा भारवर्ग में रजत पदक जीता था।
भविष्य में भारत को सुशीला देवी लिकमाबम से वैश्विक मंचों पर जूडोका में स्वर्ण पदक की उम्मीद है।
--आईएएनएस
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