नई दिल्ली, 12 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस्लामाबाद में आयोजित अमेरिका-ईरान समझौता वार्ता विफल होने के बाद मिडिल ईस्ट के हालात फिर से चिंताजनक हो गए हैं। खासकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर दुनियाभर में चिंता है। इस विषय पर रक्षा विशेषज्ञ पीके सहगल से बात की गई तो उन्होंने भारत के नजरिए से इसे बहुत ही गंभीर बताया।
रक्षा विशेषज्ञ पीके सहगल ने कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खुल जाए या न खुले, सारी दुनिया के लिए आने वाला जो समय है वह बहुत ही भयानक होने वाला है। भारत ने फिलहाल के लिए तो इंतजाम कर लिया है, लेकिन लंबे समय के लिए सबसे ज्यादा नुकसान भारत को ही होने वाला है। ईरान में इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से तबाह हो चुका है। रिफाइनरी को नुकसान पहुंचा है। पाइप लाइन्स और पोर्ट बर्बाद हो चुके हैं। इन सबको दोबार से तैयार करने में बहुत लंबा समय लगने वाला है। कई साल भी लग सकते हैं। ऐसे में भारत के अलावा पूरी दुनिया में इसका असर दिखने वाला है।
उन्होंने बताया कि भारत की बात करें तो भारत का 88 प्रतिशत एलपीजी और 20 प्रतिशत एलएनजी वहां से आता है। 59 प्रतिशत ऑयल वहां से आता है। दूसरा पहलू ये है कि वहां से भारत को 65 से 70 बिलियन डॉलर मिलते थे रेमिटेंस के रूप में, वो बंद हो गए। इसके अलावा भारतीय किसानों के लिए यूरिया और फर्टिलाइजर का 40 प्रतिशत कच्चा माल वहां से आता था। इसके साथ ही भारत जेनेरिक दवाओं का बड़ा हब बन गया है, उसका 35 से 40 प्रतिशत कच्चा माल भी ईरान से आता था। भारत की प्लास्टिक इंडस्ट्री का 35 से 40 प्रतिशत कच्चा माल वहां से मिलता था। इसके अलावा भारत के सबसे जरूरी हीलियम, जो भारत के सेमीकंडक्टर हब के सपने के लिए सबसे जरूरी चीज है, वह भी 45 प्रतिशत वहीं से आता था।
सहगल ने आगे बताया कि इस संघर्ष का असर भारत के दृष्टिकोण से देखा जाए तो फ्रेट चार्ज के साथ-साथ इंश्योरेंस चार्ज बढ़ जाएंगे। साथ ही इंडिया मिडिल ईस्ट इकोनॉमिक कोरिडोर (आईमैक) एक तरह से खत्म ही हो गया है। इसके अलावा यूएई-यूएसए-इंडिया-इजरायल (यूटूआईटू) भी खत्म हो गया है। चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान के साथ हमारी सीधी कनेक्टिविटी थी, वह अब खत्म हो गई है। इसके अलावा नॉर्थ-साउथ कोरिडोर, जो रूस और सेंट्रल एशिया में व्यापार करने का सुगम मार्ग था, वह भी ठप हो गया है। इस लिहाज से पूरी दुनिया के साथ-साथ भारत को तो जबरदस्त नुकसान है।
--आईएएनएस
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