नई दिल्ली, 18 अगस्त (आईएएनएस)। 19 अगस्त की तिथि वह दिन है जब हिंदी साहित्य को दो ऐसी महान विभूतियां प्राप्त हुईं, जिन्होंने अपनी रचनाधर्मिता और जीवटता से समाज को नई दिशा दी। एक ओर, जहां हरिशंकर शर्मा ने अपनी लेखनी और जीवन को सीधे तौर पर ब्रिटिश हुकूमत और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक हथियार बनाया, वहीं दूसरी ओर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी मेधा से भारतीय संस्कृति और इतिहास की गहराइयों में छिपे मानवतावादी सूत्रों को खोजकर आधुनिक समाज को आत्मसम्मान और करुणा का पाठ पढ़ाया।
19 अगस्त 1891 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद स्थित हरदुआगंज में जन्मे हरिशंकर शर्मा को साहित्यिक संस्कार विरासत में प्राप्त हुए थे। उनके पिता पंडित नाथूराम शंकर शर्मा स्वयं हिंदी के एक प्रसिद्ध कवि थे। बिना किसी औपचारिक या स्कूली शिक्षा के हरिशंकर शर्मा ने घर पर ही स्वाध्याय के माध्यम से उर्दू, फारसी, गुजराती और मराठी भाषाओं पर असाधारण अधिकार प्राप्त कर लिया था।
प्रसिद्ध निबंधकार बाबू गुलाबराय ने उनके संबंध में लिखा था कि उनका व्यक्तित्व अहं और दंभ की सीमाओं से पूर्णतः मुक्त था और साहित्यकार विष्णु प्रभाकर उन्हें 'सरलता की प्रतिमूर्ति' मानते थे। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने उनके इसी संत स्वभाव के कारण लिखा था कि हरिशंकर शर्मा के समान साधुमना और सौम्य साहित्यकार विरले ही होते हैं।
अपने साहित्यिक जीवन में उन्होंने 'घास-पात', 'पिंजरा पोल', 'चिड़ियाघर' और 'मटकाराम मिश्र' जैसी कालजयी व्यंग्य रचनाएं रचीं, जिनके माध्यम से उन्होंने समाज में व्याप्त रूढ़ियों, कुरीतियों और राजनीतिक विद्रूपताओं पर अत्यंत तीखा प्रहार किया। 'घास-पात' के लिए उन्हें 'देव पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त, एक यशस्वी पत्रकार के रूप में उन्होंने 'आर्यमित्र', 'ज्ञानगंगा', और 'दैनिक दिग्विजय' जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का कुशल संपादन किया, जिसे महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी पत्रकारिता का एक स्वर्णिम अध्याय माना। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके इस अप्रतिम योगदान के लिए 1966 में उन्हें 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
इसी ऐतिहासिक तिथि, 19 अगस्त 1907 को बलिया जिले के ओझवलिया (आरत दुबे का छपरा) गांव में जन्मे डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य के आलोचनात्मक और निबंधात्मक स्वरूप को हमेशा के लिए बदल दिया। संस्कृत और ज्योतिष के प्रकांड विद्वान पिता अनमोल द्विवेदी से प्राप्त ज्ञान की नींव पर खड़े होकर, उन्होंने शांतिनिकेतन (1930-1950) में रवींद्रनाथ टैगोर और क्षितिमोहन सेन के सान्निध्य में अपने साहित्यिक दृष्टिकोण को परिपक्व किया।
हजारी प्रसाद द्विवेदी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने भारतीय परंपरा को रूढ़ियों का बोझ नहीं बनने दिया बल्कि उसे एक प्रवाहमान नदी के रूप में देखा। उन्होंने कबीर के अक्खड़पन और फक्कड़पन का ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हुए उन्हें 'वाणी का डिक्टेटर' घोषित किया। उनके ललित निबंधों, विशेषकर 'कुटज' में अदम्य 'जिजीविषा' (जीने की इच्छा) का जो दर्शन मिलता है, वह मानव जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा है। हिमालय की सूखी और नीरस चट्टानों पर उगने वाले कुटज के पौधे को उन्होंने स्वाभिमान और अपराजित जीवन-शक्ति का प्रतीक माना, जो यह संदेश देता है कि विषम परिस्थितियों में भी बिना किसी की चापलूसी किए शान से कैसे जिया जाता है।
'बाणभट्ट की आत्मकथा' जैसे ऐतिहासिक उपन्यास के माध्यम से उन्होंने स्त्री चेतना, मानवीय प्रेम और तत्कालीन समाज का जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि साहित्य का परम लक्ष्य लोकमंगल और मनुष्य को संवेदनशीलता के उच्च शिखर पर ले जाना है। 1957 में 'पद्म भूषण' और 1973 में निबंध संग्रह 'आलोक पर्व' के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्य आज भी मानवीय मूल्यों का सबसे बड़ा पैरोकार है।
--आईएएनएस
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