राहुल गांधी एरोगेंट, प्रियंका से भारतीयता का बोध : शकील अहमद (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)

राहुल गांधी एरोगेंट, प्रियंका से भारतीयता का बोध : शकील अहमद (आईएएनएस एक्सक्लूसिव)

नई दिल्ली, 25 जनवरी (आईएएनएस)। कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ नेता शकील अहमद ने रविवार को आईएएनएस से खास बातचीत की। उन्होंने कई सवालों का बेबाकी से जवाब देते हुए पार्टी के वर्तमान नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता, पार्टी के आंतरिक कामकाज, शशि थरूर जैसे नेताओं के साथ व्यवहार और लगातार चुनावी हार पर खुलकर बात की है।

सवाल : राहुल गांधी कैसे नेता हैं? राजनीति में उनकी छवि पर आपकी क्या राय है?

जवाब : राहुल गांधी गंभीर नेता हैं। मीडिया और भाजपा के लोगों ने हिंदी की वजह से उनकी छवि पप्पू टाइप की बनाई है। भारत में कई तरह की भाषा बोली जाती है। लोग लोकल भाषा में बोलते हैं और उसे अंग्रेजी में अनुवाद करते हैं। मैं हिंदी भाषा का शिष्य हूं। अगर अंग्रेजी में मुझे कुछ बोलना है, तो कुछ गलती हो सकती है। लेकिन मेरे ऊपर राहुल गांधी की तरह कोई कैमरा लगाकर भी नहीं बैठा है। मेरे हिसाब से राहुल गांधी अंग्रेजी में सोचते हैं और हिंदी में बोलते हैं। इसी में थोड़ी गड़बड़ी हो जाती है। जैसे उन्होंने बोल दिया कि आटा 20 रुपए लीटर है। वे पढ़े-लिखे और सभ्य आदमी हैं, इसमें किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए। उनकी पप्पू वाली इमेज हिंदी की वजह से बनी है। दूसरी तरफ लोग हिंदी में सोनिया गांधी की गलती बताते हैं। राहुल गांधी हिंदुस्तानी हैं और कहा जा सकता है कि हिंदी उनकी भाषा होनी चाहिए। लेकिन, सोनिया गांधी की पहली भाषा इटालियन है, न कि अंग्रेजी। उनकी दूसरी भाषा अंग्रेजी है और 23 साल की उम्र में भारत में आईं। इसके बावजूद सोनिया गांधी एक शब्द भी अंग्रेजी में बात नहीं करेंगी, जब तक सामने वाला इंसान अंग्रेजी नहीं बोलेगा। उनके तमाम भाषण हिंदी में लिखे होते हैं। वहीं, मनमोहन सिंह जी के तमाम भाषण और पब्लिक स्पीच उर्दू में लिखी होती थी। हमने दोनों नेताओं के साथ मंच शेयर किया है। ये बड़ी बात है कि सोनिया गांधी ने बहुत मेहनत की है। सोनिया गांधी देश के सभी लोगों से मिलती थी, जिसके कारण उन्हें पूरी जानकारी होती थी, लेकिन राहुल गांधी सिर्फ फिल्टर लोगों से मिलते हैं, जिनसे वे मिलना चाहते हैं, सिर्फ उन्हीं से मिलते हैं। जो उनके अगल-बगल के लोग कह देते हैं, उनपर वे विश्वास कर लेते हैं।

सवाल : क्या राहुल गांधी को राजनीति में किसी बात की असुरक्षा है? अगर है, तो उन्हें किस चीज की है?

जवाब : राहुल गांधी को इस बात की इनसिक्योरिटी है कि कांग्रेस पार्टी में कुछ लोग उनसे पहले नेता हो गए हैं। राहुल गांधी जब अपना पहला चुनाव जीते थे, तो उस समय मैं अपना पांचवां चुनाव जीता था। ऐसे में हम यह नहीं कह सकते हैं कि मैं सिर्फ राहुल गांधी की वजह से नेता हूं। मेरा यह कहना न सिर्फ मेरी, बल्कि राहुल गांधी की भी बेइज्जती है। मेरी ही तरह और भी लोग हैं, जिन्होंने 5-6 बार पहले चुनाव जीता है। ऐसे में जब वे सीनियर नेताओं के साथ बैठते हैं, तो उन्हें बॉस वाला अनुभव नहीं होता। मेरे हिसाब से उन्हें कह दिया गया है कि आज से वे कांग्रेस के बॉस हैं। यह हम भी मानते हैं। ऐसे में राहुल गांधी सिर्फ ऐसे लोगों को अपने आसपास चाहते हैं, जो कभी कुछ नहीं हुए हों (कोई बड़ा चुनाव न जीता हो) और सिर्फ राहुल-राहुल बोलते हों।

सवाल : वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन की बड़ी वजह क्या रही है?

जवाब : सोनिया गांधी जी ने राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी जी की कांग्रेस, सभी का समावेश कर अपनी यानी सोनिया गांधी जी की कांग्रेस बनाई। उन्होंने इसके बाद कांग्रेस को कहां से कहां पहुंचा दिया। लेकिन राहुल गांधी, सोनिया गांधी जी की कांग्रेस को भी अपनी कांग्रेस नहीं बना सकें। मेरा यह दुख है। हम राहुल गांधी के विरोधी नहीं हैं। मैंने काफी समय राहुल गांधी के साथ गुजारा है। उनसे बहुत बातें की हैं। शायद हमसे एक गलती हुई है। मुझे जहां पर लगता था कि राहुल गांधी गलती कर रहे हैं, वहां पर कमरे के अंदर मैं उनको टोकता था कि यह नहीं करना चाहिए। मैं समझता था कि कांग्रेस की भलाई में ही देश की भलाई और हम लोगों की भलाई है। लेकिन हमें नहीं पता था कि राहुल गांधी को इससे ठेस पहुंचता था। शायद मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ी।

सवाल : राहुल गांधी का कांग्रेस के अन्य लोगों के साथ कैसा रवैया रहता है?

जवाब : राहुल गांधी एरोगेंट हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में शशि थरूर खड़े हुए थे। ईमानदारी से कहूं तो मैं शशि थरूर को वोट देना चाहता था, लेकिन जब मैंने देखा कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने मल्लिकार्जुन खड़गे को आधिकारिक प्रत्याशी के रूप में चुना है, तो मैंने सोचा कि वोट बर्बाद करने से क्या फायदा है। इसलिए मैंने खड़गे साहब को वोट दिया। खड़गे साहब तो अब भी कहते हैं कि उन्हें राहुल और सोनिया गांधी ने अध्यक्ष बनाया है। ऐसे में सोनिया और राहुल गांधी जी जिसे चाहेंगे, वह कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष रहेगा और जिसे नहीं चाहेंगे, वह अध्यक्ष नहीं रहेगा। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी में जब कोई मतभेद होता है, तो कांग्रेसी नेताओं में संशय होगा कि वे आखिर क्या करें। लेकिन जब तक तीनों साथ हैं, तब तक नेहरू-गांधी फैमिली जिसे चाहेगी, वही कांग्रेस का अध्यक्ष होगा।

सवाल : जिस प्रकार कांग्रेस पार्टी लगातार असफल रही है, ऐसे में अब क्या प्रियंका गांधी को कमान संभालनी चाहिए? और उन्हें आगे आना चाहिए।

जवाब : प्रियंका गांधी से मेरा बहुत ज्यादा संपर्क नहीं है। बहुत दिन पहले उन्होंने मुझे कांग्रेस के एक प्रोग्राम में जाने के लिए एक बार फोन किया था, जिसके बाद मैं चला भी गया था। उसके बाद आते-जाते किसी प्रोग्राम में मुलाकात हुई होगी, उससे ज्यादा नहीं। लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि प्रियंका गांधी की स्पीच पब्लिक से ज्यादा कनेक्ट करती है। उनके साथ एक भारतीयता का बोध होता है। वैसे भारतीय सभ्यता और संस्कृति को सोनिया गांधी ने जैसे निभाया है, उसकी मिसाल कम मिलती है। लेकिन प्रियंका गांधी यहीं की पैदाइश हैं। ऐसे में प्रियंका गांधी ज्यादा एक्यूरेट हैं, ज्यादा अच्छा बोलती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है। यह उस परिवार का फैसला है कि कौन कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व करेगा। तमाम कांग्रेस के लोगों को नेहरू-गांधी परिवार पर विश्वास है।

सवाल : तमाम पार्टी के नेताओं का कहना है कि राहुल गांधी की इनसिक्योरिटी के जरिए प्रियंका गांधी को बढ़ावा नहीं दिया जाता है? इस पर आप क्या कहेंगे?

जवाब : आज के समय में राहुल गांधी ही पार्टी के मालिक हैं, लेकिन उनका अंदरूनी मसला क्या है, पता नहीं है। क्या प्रियंका गांधी फ्रंट में आना चाहती हैं या नहीं आना चाहती हैं? भाई के पीछे रहकर बागडोर संभालना चाहती हैं? जनता के बीच दोनों भाई-बहनों में कोई फर्क नजर नहीं आता है। दोनों में बहुत प्रेम नजर आता है। इसलिए अंदर की बात जो हम नहीं जानते हैं, उसपर मेरा कुछ कहना ठीक नहीं है। बाहर से हम कह सकते हैं कि प्रियंका गांधी का जनता से जुड़ाव और उनका भाषण किसी भी दूसरे नेता के मुकाबले बहुत अच्छा है।

सवाल : लंबे समय से आपने बिहार में राजनीति की। आपको बिहार में कांग्रेस की इतनी बड़ी हार की क्या वजह लगती है?

जवाब : मुझे नहीं लगता कि कांग्रेस के परिणाम में बहुत ज्यादा अंतर पड़ता। बिहार में कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई है। हमारे गठबंधन में सिर्फ दो सेक्शन बच गए हैं। एक यादव समाज, लालू यादव की वजह से, और दूसरा मुस्लिम समाज, कांग्रेस और राजद के मिलने की वजह से। बाकी लोग लगभग एक तरफ हैं। ऐसे में करीब 65 और 35 प्रतिशत का फर्क है। लेकिन कुछ उम्मीदवारों के नाम लेकर आरोप लगे हैं कि पैसा लेकर उनको टिकट दिया गया है। कांग्रेसियों को वहीं टिकट मिला, जहां पर कोई खरीदार नहीं था। लेकिन इसकी कोई जांच नहीं हो रही है। इसके लिए कोई जिम्मेदारी तय नहीं हो रही है। मैं नहीं कहता कि इससे नतीजों में बहुत फर्क पड़ेगा। राहुल गांधी बिहार चुनाव से पहले संविधान की एक प्रति लेकर घूमते थे और कहते थे कि उन्हें भाजपा और आरएसएस से संविधान बचाना है। चुनाव से एक महीने पहले से नामांकन से एक दिन पहले तक वे यही करते हैं। कांग्रेस करीब 60 सीट लड़ती है और कई सीटों पर भाजपा से नेताओं को लाकर पार्टी ने टिकट दे दिया। ऐसे में क्या राहुल गांधी संविधान बचाने के लिए भाजपा-आरएसएस से लोगों को लाकर भाजपा-आरएसएस के खिलाफ लड़ेंगे? राहुल गांधी जनता के बीच पिछड़े, दलित और आदिवासी लोगों को लेकर भाषण दे रहे हैं। सीताराम केसरी की मृत्यु के 25 साल के बाद बिहार चुनाव के 4 दिन पहले वे उनकी पुण्यतिथि कर रहे हैं। 25 साल तक वे सोए हुए थे। ऐसे में क्या बिहार के पिछड़े नहीं समझते हैं कि हमारे वोट के लिए ऐसा किया जा रहा है? दिल्ली में पिछले तीन चुनावों से कांग्रेस की जो जीरो सीट आ रही है, उसके लिए कौन जिम्मेदार है?

सवाल : मुसलमानों को लेकर कांग्रेस का क्या रवैया है? पार्टी पर आरोप लगता है कि मुसलमान वोट तो देता है, लेकिन उनके नेता हाई कमान के आसपास नजर नहीं आते हैं?

जवाब : परिस्थिति ऐसी होती है कि मुसलमान कांग्रेस को वोट देता रहा है। कांग्रेस भी चाहती है कि उसे मुस्लिम वोट मिले। वोट तो भाजपा भी चाहती है, लेकिन वे मुस्लिम समाज के खिलाफ भाषण करती है। अगर कोई पार्टी किसी के फेवर में बोलती है, तो लोगों को लगता है कि वोट लेने के लिए बोला जा रहा है। कोई यह भी समझ सकता है कि बेवकूफ बनाने के लिए बोला जा रहा है। लेकिन अगर किसी के खिलाफ बोला जाए, तो वह यह नहीं समझेगा कि उनसे बेवकूफ बनाने के लिए बोला जा रहा है। वह सच में समझेगा कि पार्टी उसकी दुश्मन है। राहुल गांधी के दिमाग में एक बात बैठी हुई है कि मुसलमान जिस दिन पीएम मोदी से नाराज होंगे, तो कांग्रेस पार्टी दूसरे नंबर पर है, उनका साथ मिलेगा। दो नंबर से नीचे हम इसलिए नहीं जा सकते, क्योंकि नीतीश कुमार, लालू यादव, चिराग पासवान, अखिलेश यादव, चंद्रबाबू नायडू, फारूख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला और स्टालिन एक राज्य तक सीमित हैं। एक से ज्यादा राज्य में दो ही पार्टियां, भाजपा और कांग्रेस, है। भाजपा सत्ता में है, तो हम दूसरे नंबर की पार्टी पहले से हैं। हम दो नंबर से नीचे जा नहीं सकते।

सवाल : क्या कांग्रेस में शशि थरूर का बार-बार अपमान किया जा रहा है? उन्हें बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा है। इसके पीछे क्या वजह रही है?

जवाब : मैंने कांग्रेस छोड़ने के बाद भी राहुल गांधी से निवेदन किया है कि वे शशि थरूर को कांग्रेस से जाने से रोकें। केरल की लोकल राजनीति की वजह से उन्हें फोर्स किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी सिर्फ पुराने नेताओं के खिलाफ हैं। वह उनके खिलाफ भी हैं जो करिश्माई नेता हैं। तीन नेताओं के नाम इसमें सामने हैं- शशि थरूर, पी. चिदंबरम और सचिन पायलट। सचिन पायलट में कुछ समय लगेगा, लेकिन इन सभी को घर बैठाने की तैयारी है। शशि थरूर ने जैसे कहा कि वे चुनाव लड़ेंगे, वैसे ही खड़गे जी को आगे कर दिया गया। जाहिर है कि राहुल गांधी इन दोनों तरह के लोगों से डरते हैं, एक वो नेता जिससे जमीन के लोग जुड़े हों और दूसरा वो जिसकी करिश्माई छवि हो।

सवाल : राहुल गांधी बार-बार दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की बात करते हैं। लेकिन अगर उनकी टीम की बात करें तो केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, सुप्रिया श्रीनेत और पवन खेड़ा समेत तमाम आसपास के नेता सवर्ण हैं।

जवाब : एक साहेब थे, वे जो प्रवचन देते थे, लेकिन काम उसका उल्टा करते थे। उनका कहना था कि जो मैं करता हूं, वो आप मत कीजिए, लेकिन जो कहता हूं, उसे कीजिए। ऐसे में आज से करीब एक साल पहले एआईसीसी में कहा जाता था कि राहुल गांधी जनेऊधारी शिवभक्त ब्राह्मण हैं। यह एक सांकेतिक है कि वे उस समाज के भी शुभचिंतक हैं। इसके कुछ महीनों बाद कांग्रेस के एक नेता को पिछड़ों की मीटिंग से यह कह कर निकाल दिया गया कि आप पिछड़े नहीं हैं, आप आगे वाली सीट पर मत बैठिए, बाहर जाइए। मैं इस घटना के बारे में बाद में कभी लिखूंगा। मैंने यही बात कही कि उन्हें 25 साल के बाद सीताराम केसरी जी की याद उनकी पुण्यतिथि पर आई। ऐसे में यह सब वोट के लिए है। बिहार चुनाव के बाद कभी पिछड़े-दलित और आदिवासी की बात नहीं हुई। ऐसे में वे रातों-रात रंग बदलते हैं। जनता बेवकूफ नहीं है। गांव में बैठा हुआ आदमी सब समझता है कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं। राजनीति का एक सिद्धांत होता है, यह सीजनल नहीं होता है। आगे वाले का हाथ खींचकर पिछड़े को आगे नहीं लाना है। जो वास्तव में पीछे रह गए हैं, हम उन्हें सहारा देकर आगे की पंक्ति में लाएं। उच्च जाति को गाली देने से पिछड़े खुश नहीं होंगे। इसलिए राहुल गांधी को सोच-समझकर अनुभवी लोगों को अपने साथ में रखकर राजनीति करनी चाहिए।

--आईएएनएस

एससीएच/एबीएम