नई दिल्ली, 27 सितंबर (आईएएनएस)। भाद्रपद पूर्णिमा खत्म होने के बाद पितृपक्ष शुरू हो गया है। हिंदू परंपरा के मुताबिक, इस दौरान अपने पूर्वजों के नाम से तर्पण करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। ऐसे में देश के अलग-अलग हिस्सों में पितृ तीर्थों पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती नजर आ रही है। हरियाणा का कुरुक्षेत्र भी ऐसे ही प्रमुख धार्मिक क्षेत्रों में शामिल है, जहां सरस्वती नदी और प्राचीन तीर्थों से जुड़ी मान्यताओं के कारण पितृ कर्म का खास महत्व है।
कुरुक्षेत्र से लेकर पेहोवा तक ऐसी कई जगह हैं, जहां लोग अपने पूर्वजों को जल अर्पित करते हैं, पिंडदान करते हैं और उनकी शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।
कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के अनुसार पेहोवा को पृथूदक तीर्थ कहा जाता है। यह सरस्वती नदी के किनारे बसा प्रमुख तीर्थ है और महाभारत में इसे कुरुक्षेत्र के तीर्थों में बेहद महत्वपूर्ण बताया गया है। पौराणिक मान्यता है कि महाराज पृथु ने अपने पितरों के लिए यहां जल अर्पित किया था और इसी वजह से इस स्थान का नाम पृथूदक पड़ा। इस तीर्थ का जिक्र महाभारत के अलावा और वायु पुराण में भी मिलता है।
पृथूदक की धार्मिक मान्यताएं श्राद्ध, तर्पण और दूसरे कर्मकांडों से जोड़ती हैं। पितृ पक्ष में जब लोग अपने पूर्वजों को याद करते हुए जल अर्पित और अन्न दान करते हैं, तो इसमें परिवार की पिछली पीढ़ियों के प्रति कृतज्ञता जताने का भाव शामिल होता है।
पृथूदक के अलावा कुरुक्षेत्र का सन्निहित सरोवर भी पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह कुरुक्षेत्र से करीब 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हरियाणा पर्यटन के अनुसार मान्यता है कि अमावस्या के दिन यहां सभी तीर्थों का समागम होता है। सन्निहित सरोवर एक ऐसी जगह है, जहां अमावस्या और सूर्य ग्रहण के समय सात पवित्र नदियों का जल एकत्र होता है। इसी वजह से इस सरोवर में स्नान और धार्मिक अनुष्ठान का विशेष महत्व माना जाता है।
हरियाणा पर्यटन के अनुसार, यहां सूर्य ग्रहण के समय बड़ी संख्या में तीर्थयात्री पहुंचते हैं। सन्निहित सरोवर के घाटों पर श्रद्धालु स्नान के साथ पूजा-पाठ और पितरों के लिए किए जाने वाली पूजा-पाठ करते हैं।
पितृ तीर्थों की लिस्ट में पिण्डास्क नाम का भी उल्लेख मिलता है। यहां पितृ पक्ष और अमावस्या जैसे मौकों पर श्रद्धालु स्नान, पिंडदान और तर्पण करने आते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इसका संबंध महाभारत काल और पांडवों से जोड़ा जाता है। इसलिए इसे 'पिण्डास्क' और 'पिंड तारक तीर्थ' जैसे नामों से भी जाना जाता है।
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