नई दिल्ली, 18 जनवरी (आईएएनएस)। माघ मेला हो, कुंभ हो या महाकुंभ हर बार अमावस्या का स्नान खास मायने रखता है। यह केवल स्नान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, पितरों का तर्पण और अनंत विश्वास का महापर्व है। माघ मेले की खूबसूरती को दिवंगत साहित्यकार कैलाश गौतम की कविता "अमौसा के मेला" में इतनी जीवंतता से उकेरा गया है कि हर पंक्ति में प्रयागराज के संगम तट की दिव्य भीड़, आस्था की लहरें, ग्रामीण जीवन की मासूमियत और लोक संस्कृति का रंग-बिरंगा मेला अपने रंग को बिखेरता दिखता है।
भोजपुरी की मिठास से सराबोर यह रचना मेले की दिव्य भीड़, ग्रामीण जीवन की सादगी, नई-नवेली दुल्हन की मासूम चाल और साधु-संतों की छटा को इतनी मार्मिकता से उकेरती है कि हर पंक्ति में आस्था की लहरें उमड़ पड़ती हैं जैसे पूरा गांव भक्ति के रंग में रंगकर अमौसा नहाने चल पड़ा हो। कविता के माध्यम से कवि ने बताया कि माघ या अमावस्या का मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति, हंसी-आंसू और रिश्तों का जीवंत चित्रण है।
आज मौनी अमावस्या है, कैलाश गौतम साल 1989 के कुंभ के समय रची गई कविता को भोजपुरी की मिठास के साथ पूरे गांव को रंगते हुए दिखाते हैं-"भक्ति के रंग में रंगल गांव देखऽ, धरम में, करम में, सनल गांव देखऽ। अगल में, बगल में सगल गांव देखऽ, अमौसा नहाये चलल गांव देखऽ।"
कैलाश गौतम की यह रचना माघ मेले की आत्मा है, जहां लाखों लोग एक साथ स्नान करते हैं, लेकिन हर व्यक्ति की अपनी छोटी-बड़ी कहानी होती है। ये कविता याद दिलाती है कि मेला केवल तीर्थ नहीं, बल्कि रंगों, भावनाओं से भरा है। मौनी अमावस्या की इस शांति में भीड़ का कोलाहल सुनाई देता है और कैलाश गौतम के शब्दों में वो खूबसूरती अमर हो जाती है।
वह कविता के माध्यम से बताते हैं कि अमावस के मेले में यहां हर कोई झोला-बोरा लिए, गठरी संभाले, परिवार को लेकर चल पड़ता है। नई-नवेली दुल्हन धीरे-धीरे चलती है जैसे भरी नाव नदी तट पर हो। रेलगाड़ी खचाखच भरी है, लोग एक-दूसरे को धकेलते, "बप्पा रे बप्पा, आ दईया रे दईया, तनी हम्मे आगे बढ़े देतऽ भईया। जरा हमको आगे बढ़ने देते भईया" आपस में हिताई-मिताई, पढ़ाई-कमाई, दरोगा की तबादले की बातें करते हैं। साधु-संतों की छटा, नारियल चढ़ाते भक्त, मंदिर में दर्शन की लाइन, शिवजी को दूध से अर्घ्य – सब कुछ इतना जीवंत कि लगता है कि पाठक खुद को उस भीड़ में खड़े पाते हैं। वह लिखते हैं, "एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा, कमरी में केहू, कथरी में केहू, रजाई में केहू, दुलाई में केहू।"
कविता में फिर वो मार्मिक पल आता है, जब सामान खो जाते हैं, "कलउता के माई के झोरा हेराइल, बुद्धू के बड़का कटोरा हेराइल"। जिसे लोग ढूंढते फिरते हैं, लेकिन मेले की मस्ती थमती नहीं। भौजी संग मेले में पहुंचे भैया खर्चा जोड़ते-जोड़ते थक जाते हैं। ये सब मिलकर माघ मेले को एक परिवार का, समाज का, संस्कृति का महोत्सव बनाते हैं।
--आईएएनएस
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