कच्छ की कॉपर बेल कला को मिली वैश्विक पहचान, अमेरिका-यूके तक हो रहा घंटियों का निर्यात

कच्छ की कॉपर बेल कला को मिली वैश्विक पहचान, अमेरिका-यूके तक हो रहा घंटियों का निर्यात

कच्छ, 28 अप्रैल (आईएएनएस)। गुजरात के कच्छ की प्राचीन कॉपर बेल यानी तांबे की घंटियों की हस्तकला आज वैश्विक पहचान बना चुकी है। कच्छ के झुरा गांव को इस पारंपरिक कला का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां कई पीढ़ियों से कारीगर इस विरासत को संजोए हुए हैं। समय के साथ यह कला न केवल स्थानीय जरूरतों तक सीमित रही, बल्कि अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी मजबूत जगह बना चुकी है।

कॉपर बेल बनाने की प्रक्रिया बेहद जटिल और मेहनत भरी होती है। यह घंटियां मुख्य रूप से तीन हिस्सों, बॉडी, कैप और हैंडल से मिलकर बनती हैं। सबसे पहले लोहे की शीट से घंटी का ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद उस पर तांबे या पीतल की कोटिंग की जाती है और फिर भट्टी में पकाया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद कारीगर घंटियों को अंतिम आकार देते हैं और उनमें खास ध्वनि पैदा की जाती है।

कॉपर बेल शिल्पकार अभिषेक लोहार ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए बताया कि इस कला में परिवार के सभी सदस्य शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआती ढांचा तैयार करने के बाद महिलाएं कोटिंग का काम करती हैं। इसके बाद घंटियों को फर्नेस में पकाया जाता है और फिर उन्हें फाइनल प्रोसेस में लाकर साउंड और फिनिशिंग दी जाती है। तैयार होने के बाद इन घंटियों को देश-विदेश में निर्यात किया जाता है।

कई साइज में बनाई जाने वाली कॉपर बेल कच्छ की शिल्पकारी की विरासत को संजोए हुए हैं। एक समय था जब कच्छ में गाय और भैंस के गले में बांधने के लिए तांबे की घंटियां बनाई जाती थीं, लेकिन अब डेकोरेटिव आइटम के रूप में भी इन घंटियों की मांग बढ़ गई है।

कॉपर बेल शिल्पकार जावेद अब्दुल्ला ने बताया कि पुराने जमाने से हम जो ज्यादातर चीजें लाए हैं, वो घंटियां हैं। हम इस छोटी सी एक नंबर घंटी से लेकर 13 से 14 नंबर तक की घंटियां बनाते हैं। हमारी सबसे महंगी घंटी नक्काशी वाली घंटी है। इस नक्काशी वाली घंटी को लोग गाय और भैंसों के लिए खरीदते हैं।

कॉपर बेल शिल्पकार जानमामद लोहार ने बताया कि हमारी जो कॉपर बेल हस्तकला है, उसे सरकार की योजनाओं से बहुत लाभ मिला है। इन स्कीमों में हमें अलग-अलग डिजाइन मिले, जैसे गरवी गुर्जरी स्कीम।अब हम घर में सजावट के लिए इस्तेमाल की जाने वाली घंटियां भी बना रहे हैं, जिनकी आज बहुत मांग है।

इतना ही नहीं, जीआई टैग मिलने के बाद कच्छ की कॉपर बेल शिल्पकला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खासी लोकप्रिय हो रही है। इससे जहां देश-विदेश में इनकी मांग बढ़ी है, वहीं शिल्पकार भी सशक्त हो रहे हैं। पारंपरिक तांबे की घंटी अब करीब 500 अलग-अलग डिजाइन में तैयार की जा रही है, साथ ही अमेरिका और ब्रिटेन जैसे कई देशों में एक्सपोर्ट की जा रही है। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में गुजरात सरकार के प्रयासों से कच्छ के बॉर्डर गांवों की यह प्राचीन शिल्पकला आज न केवल नया मुकाम हासिल कर रही है, बल्कि इससे ग्रामीण इलाकों में रोजगार बढ़ने से लोकल इकोनॉमी भी मजबूत हो रही है।

--आईएएनएस

एसएके/वीसी