कर्पूरी ठाकुर: असहाय लोगों के महायोद्धा, जिनके लिए मुख्यमंत्री दफ्तर में लगती थी गरीबों की भीड़

कर्पूरी ठाकुर: मुख्यमंत्री के दफ्तर में भरी रहती थी गरीबों की भीड़, कभी खुद बीच में खाने बैठ जाते थे खाना, सामाजिक न्याय के योद्धा का वह किस्सा

नई दिल्ली, 23 जनवरी (आईएएनएस)। "दंगा रोकने में मौजूदा सरकार विफल रही है। जहां तक हरिजनों, आदिवासियों और कमजोर वर्गों पर आफत की बात है, कुछ पूछिए मत। जैसे 32 दांतों के बीच में बेचारी जीभ रहती है, वे लोग इस राज में रह रहे हैं।" समाज में शोषण और दोहन की लंबी परंपरा रही है, लेकिन असहाय और शोषित वर्ग के हितों के महायोद्धा कर्पूरी ठाकुर के ये विचार आज भी सामाजिक न्याय की नींव हैं। उनके ये शब्द बिहार के मुसहर टोली से लेकर विधानसभा तक लगभग आधी सदी तक गूंजते रहे।

करोड़ों बेजुबान लोगों की आवाज बनने वाले गरीबों के मसीहा की जीवन यात्रा 24 जनवरी 1924 से शुरू हुई। बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौंझिया गांव (अब कर्पूरी ग्राम) में उनका जन्म हुआ। पद्म पुरस्कारों के लिए आधिकारिक वेबसाइट पर कर्पूरी ठाकुर के शुरुआती जीवन के बारे में जिक्र मिलता है कि

विदेशी शासन वाले भारत के जातिग्रस्त समाज में परिवार सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक रूप से पिछड़ा हुआ था। वे जमींदारों की विशाल हवेलियों के बाहर तपती धूप में खड़े रहते और उन्होंने हवेली के अंदर सुविधा प्राप्त बच्चों को पढ़ाए जा रहे पाठों को सुनकर पाठ्य पुस्तकों का ज्ञान हासिल किया। वह उस समय 10वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा पास करने वाले कुछ लोगों में से थे। सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हुए, उन्होंने प्रतिष्ठित सीएम कॉलेज में दाखिला पाया।

इंटरमीडिएट करने के बाद नाममात्र की कॉलेजी शिक्षा सी.एम. कॉलेज दरभंगा में प्राप्त की, क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ने के कारण उनकी उच्च शिक्षा अधूरी रही। महाविद्यालय का छात्र रहते हुए महात्मा गांधी के 'करो या मरो' के आह्वान पर 1942 में कर्पूरी ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेना शुरू कर दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन के साथ संघर्ष की जो गाथा प्रारंभ हुई, कर्पूरी जी के जीवन का वही एक अभिन्न अंग बन गई। यहीं से दलितों, पिछड़ों, शोषितों, गरीब-गुरबों के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक उत्थान के लिए संघर्ष शुरू हो गया।

'सोए वतन को जगाने चले हैं, हम मुर्दा दिलों को जिलाने चले हैं।' इसे कर्पूरी ठाकुर ने सिर्फ खाली पन्नों पर गहरी स्याही से उकेरा नहीं था, बल्कि जीवन में आत्मसात कर लिया था। भीम सिंह अपनी लेखनी 'गुदड़ी के लाल: व्यक्तित्व एवं कृतित्व' में लिखते हैं, "कर्पूरी ठाकुर के व्यक्तित्व पर एक ओर जहां महात्मा गांधी का प्रभाव पड़ा, वहीं दूसरी ओर नेताजी सुभाषचंद्र बोस से भी वे बड़े प्रभावित थे।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और पंडित रामनंदन मिश्र सरीखे समाजवादी नेताओं के नेतृत्व में समाजवादी आंदोलन में कर्पूरी की भूमिका नजर आने लगी थी और इसके साथ उनका हौसला बुलंदियों की ओर बढ़ रहा था। 'भारत छोड़ो' जैसे आंदोलनों ने कर्पूरी ठाकुर को और मजबूत बनाया, जिसमें वे न सिर्फ सक्रिय रूप से शामिल हुए, बल्कि 1943 में गिरफ्तारी भी देनी पड़ी थी। उन्होंने 1945 में जेल से रिहा होने के बाद भी संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा। उन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध और भूमिहीन किसानों के हित में अहिंसक संघर्ष जारी रखा।

जब संघर्षों की मसाल कर्पूरी ठाकुर थाम चुके थे, तब एक कवि ने लिखा था, "वो आदमी, जो भीड़ से घिरा है, बहुतों की नजर में सिरफिरा है। वो आदमी, जो भीड़ में घिरा है, दरअसल परमात्मा नहीं, भीड़ की आत्मा है।"

वे न सिर्फ बिहार बल्कि देश के एक अनूठे नेता बन चुके थे। कई मायनों में वे दुर्लभ गुणों वाले व्यक्ति बन चुके थे। जिन्होंने कर्पूरी ठाकुर को देखा, उनके लिए कर्पूरी ठाकुर के विराट व्यक्तित्व की छाया ऐसी ही थी।

राजनीति उनकी मूल प्रेरणा नहीं थी। उनकी मुख्य प्रेरणा थी जनता की सेवा, जिसे उन्होंने जीवन से कभी दूर नहीं होने दिया। भविष्य में भले ही उन्होंने 1957 और 1962 में ताजपुर से जीतकर हासिल विधानसभा का रास्ता तय कर लिया था, फिर आगे चलकर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया, न कि धन कमाने का।

प्रसार भारती के एक इंटरव्यू में उनको नजदीक से देखने वाले एक व्यक्ति ने बताया, "मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनका चैंबर गरीबों से भरा रहता था। जिससे अफसर लोग भी परेशान होने लगे थे। अफसर कहा करते थे कि गरीब लोग मुख्यमंत्री के कमरे में बैठे रहते हैं।"

उन्होंने एक किस्सा बताया कि एक दिन वह खुद सर्किट हाउस गए थे। कर्पूरी ठाकुर वहां जब खाना खाने लगे थे, तब उन्होंने सभी छोटी श्रेणी के कर्मचारियों को भी खाने पर बुला लिया था। उन्होंने सबके साथ बैठकर खाना खाया था। उस समय एक कलेक्टर ने कहा था कि यह क्या तमाशा लगा रखा है कि सभी लोग मुख्यमंत्री के साथ खाना खाएंगे। मैंने कलेक्टर से कहा था कि जब मुख्यमंत्री सभी के साथ खाना चाहते हैं तो आप किसको रोक सकते हैं। बाद में मैंने कर्पूरी ठाकुर से जाकर शिकायत की थी।

यही कारण था कि कर्पूरी ठाकुर को लोगों का प्यार हमेशा मिलता रहा। कर्पूरी ठाकुर ने जो भी पद हासिल किया, धर्म और जात-पात से दूर सभी को समान भाव से देखा। उनकी इसी निस्वार्थ सेवा और गरीबों के प्रति अटूट प्रेम के कारण लोगों ने उन्हें प्यार से 'जननायक' पुकारा।

--आईएएनएस

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