नई दिल्ली, 3 जनवरी (आईएएनएस)। यह कहानी है एक ऐसी शख्यियत की, जिन्हें 'मौत' लंबी उम्र का आशीर्वाद देकर गई तो ईश्वर ने खास कला और हुनर के रूप में हसीन मेहरबानियां कीं। बात हो रही है कि कवि और लेखक गोपालदास नीरज की, जिन्हें हिंदी साहित्य में एक काव्य वाचक और गीत लेखक के रूप में पहचान मिली।
"मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है, आशाओं का संसार नहीं मिलता है। भवसागर में लहरों की आलन से, मैं टकराता फिरता तट के कण-कण से पर मुझे डुबाकर गर्क कहीं तो कर दे, ऐसा भी वज्रधार नहीं मिलता है, मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है।"
इटावा (उत्तर प्रदेश) में 4 जनवरी 1925 को जन्मे गोपालदास नीरज की कविताओं में भावुकता थी।
बचपन में घर के छज्जे पर चढ़कर जब गोपालदास नीरज अपने गीत सुनाया करते थे, तो घर के बाहर भीड़ जुट जाया करती थी। बाल मन यही सोचा करता था कि ईश्वर ने उन्हें एक खास प्रतिभा दी है। पिता का सिर से साया छिन जाने के बाद बुआ के यहां रहते हुए उन्होंने 1941 में पहली कविता लिखी, उस समय वह 9वीं कक्षा में पढ़ते थे। वहीं से कवि के रूप में गोपालदास नीरज ने अपनी जिंदगी का नया सफर शुरू किया।
उन्होंने बलवीर सिंह 'रंग' को एक कवि सम्मेलन में सुना था। उनकी कविता सुनकर एक कवि बनने का ख्वाब गोपालदास के मन में पनपने लगा। बलवीर सिंह 'रंग' की उस अप्रत्यक्ष प्रेरणा से उन्होंने कविता लिखना शुरू किया। प्रसार भारती के एक इंटरव्यू में गोपालदास ने यह किस्सा बताया था।
1942 में सरकारी नौकरी के लिए गोपालदास का दिल्ली आना हुआ था। एक दिन अखबार में पढ़ा कि यहां एक कवि सम्मेलन होने वाला है। वे ढूंढते-ढूंढते उस कार्यक्रम में पहुंच गए। संयोजक से मुलाकात की और उन्होंने कवि के रूप में अपना परिचय दिया।
गोपालदास चाहते थे कि वह उस मंच पर अपनी कविता से महफिल को लूट लें। वह पूरी तरह तैयार थे, लेकिन संयोजक मानने को तैयार नहीं थे। जैसे-तैसे गोपालदास ने संयोजक को राजी कर लिया, लेकिन शर्त यह थी कि कार्यक्रम में उन्हें सबसे पहले कविता पढ़नी होगी। फट से गोपालदास राजी हो गए, क्योंकि उन्हें एक मंच मिल रहा था। फिर वह वक्त आया, जब मंच पर खड़े होकर अपने मधुर स्वरों से कविताओं का ऐसा राग छेड़ा कि जनता उनके साथ बंधती चली गई।
एक गीत के साथ गोपालदास को मंच मिला था, लेकिन दूसरा, फिर तीसरा गीत, इसी तरह जनता की फरमाइश पर फरमाइश होती रही। गोपालदास ने कवि के रूप में अब तक जो लिखा था और संजोया था, सब मंच पर सुना डाला। आखिर में उनकी लिखी कविताएं निपट चुकी थीं, लेकिन जनता उन्हें और सुनना चाहती थी। गोपालदास ने अपना सबसे अनमोल खजाना मंच पर खोला, जो बचपन में उनकी मां ने उन्हें भजनों के रूप में दिया था।
बचपन में मां से सुने भजनों को गोपालदास ने अपनी कवि वाणी से जनता के बीच रखा, जिसे खूब प्यार मिला। यहां तक कि उसी मंच पर एक महाशय ने इनाम के तौर पर गोपालदास को 5 रुपए दिए, जो उस जमाने में बहुत बड़ी रकम थी। बड़े-बड़े कवि मंच पर बैठे थे, लेकिन जनता की फरमाइश गोपालदास के लिए होती रही। आखिर में जनता के बीच उन्हें कहना पड़ा कि अब उनके पास सुनाने के लिए कुछ बचा नहीं है।
शोहरत भी मिली, प्यार भी मिला, यश भी मिला, प्यार भी मिला, लेकिन इन सबके बीच में अगर आदमी गहराई से सोचता है तो आत्मा के स्तर पर वह कहीं अकेला होता है। ये अकेलेपन की भावना सब समृद्धि और सुख के बीच में मुझे सालती रही। तब गोपालदास ने लिखा,
"चाहे हो दीवाली-होली, चाहे लगे मेले
आए हम अकेले, यहां जाएंगे अकेले।"
"हम पत्ते तूफान के
हम किसको क्या दे-लें, हम तो बंजारे वीरान के।
ऊपर उठते नीचे गिरते, आंधी संग भटकते फिरते,
जिस पर लंगर नहीं, मुसाफिर हम ऐसे जरिया के।"
गोपालदास नीरज के इन शब्दों का मतलब था कि इंसान एक नौका पर चल रहा है, जिस पर कोई लंगर नहीं है, कोई साथी नहीं है और कोई खवैया नहीं है। उनका संदेश था कि अकेले ही आए हैं और अकेले ही जाएंगे।
'इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, लगेंगी आपको सदियां हमें भुलाने में।"
आज भी उसके लिए होती हैं पागल कलियां, कोई तो बात है नीरज के गुनगुनाने में।
रूमानी तबीयत के एक ऐसे व्यक्ति, जिसे कहने में उन्हें कोई हिचकिचाहट नहीं थी। उन्होंने कहा कि कवि और कलाकार, जो रूमानी नहीं है, वह न कवि हो सकता है और न कलाकार हो सकता है। रूमानियत कुछ नहीं, बल्कि एक सौंदर्य और प्रेम के लिए अदम्य प्यास का नाम है। मेरा जीवन भी रूमानी रहा है।
हालांकि एक वक्त ऐसा भी आया, तब गोपालदास की मुलाकात असलियत में 'मौत' से हुई। गोपालदास जिंदगी के उस किस्से के बारे में बताते हैं, "मैं एक दिन फिल्म के दूसरे शो को देखकर लौट रहा था। उस दौर में म्युनिसिपल बोर्ड की लाइटें जला करती थीं। अकेला चला आ रहा था, तो मन में डर भी था। डर को दूर करने के लिए गीत गुनगुनाते हुए हल्के-हल्के कदमों से आगे बढ़ रहा था। जब गली के पास पहुंचना हुआ तो मुड़ते हुए जल्दबाजी में एक बुजुर्ग महिला से टकराया।"
गोपालदास कहते हैं, "उस बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि 'मुझसे क्यों टकराता है, तुझे तो अभी बहुत दिन जीना है।' जब उसने वह वाक्य कहा तो मैं चौंक उठा और सोचने लगा कि इस वाक्य का क्या मतलब है। लेकिन ये देखने के लिए कि यह बुजुर्ग महिला कहां जा रही है, मैं एक कोने पर खड़ा हो गया। उस बुजुर्ग महिला ने मेरी ही गली में पड़ने वाले एक मकान में कदम रखा। जैसे ही उसने मकान में प्रवेश किया, अंदर से रोने की तेज आवाज आई, जैसे कोई व्यक्ति मर गया हो। मैं यह देखकर, सुनकर और भी हैरान था। मैं उस मकान में गया और देखा कि एक मरे हुए व्यक्ति को कुछ लोग चारपाई से नीचे उतार रहे थे, लेकिन वह बुजुर्ग महिला वहां कहीं दिखाई नहीं दी।"
कवि ने बताया, "मैं समझता हूं कि मृत्यु से वह मेरा पहला साक्षात्कार था। मृत्यु ने ही मुझे आशीर्वाद दिया था कि तुझे अभी बहुत दिनों जीना है। मेरे साथ अनेकों घटनाएं हुईं, ऐसे एक्सीडेंट हुए कि जिनमें कोई इंसान बच नहीं सकता था, लेकिन मैं जिंदा रहा और शायद वह उसी मौत (बुजुर्ग महिला) का दिया हुआ आशीर्वाद था।"
19 जुलाई 2018 में उनका निधन हो गया था।
--आईएएनएस
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