गयाजी, 23 सितंबर (आईएएनएस)। बिहार का गया (गयाजी) सिर्फ एक ऐतिहासिक शहर ही नहीं बल्कि हिंदू धर्म में पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए बेहद पवित्र स्थान माना जाता है। खासकर पितृपक्ष के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना लेकर पहुंचते हैं। गया में पिंडदान की परंपरा माता सीता द्वारा अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान करने से जुड़ी है।
मान्यता है कि यह कहानी उस समय की है जब भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास में थे। इसी दौरान उन्हें राजा दशरथ के निधन का समाचार मिला। पिता के निधन की खबर सुनकर भगवान राम को गहरा दुख हुआ। अपने पिता के प्रति कर्तव्य निभाने और उनका श्राद्ध-पिंडदान करने के लिए भगवान राम और लक्ष्मण गया पहुंचे। कहा जाता है कि गया में फल्गु नदी के किनारे पिंडदान की तैयारी शुरू की गई।
भगवान राम और लक्ष्मण पिंडदान के लिए जरूरी सामग्री जुटाने के लिए वहां से चले गए। इसी बीच पिंडदान का शुभ समय बीतने लगा। पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा दशरथ की आत्मा ने माता सीता से पिंडदान करने का आग्रह किया। सीता ने कहा कि पिंडदान करने का अधिकार तो पुत्र का होता है और राम अभी यहां मौजूद नहीं हैं। तब दशरथ की आत्मा ने उन्हें समझाया कि अब वह उनके परिवार का हिस्सा हैं और उनके हाथों से किया गया पिंडदान भी उन्हें स्वीकार होगा।
समय निकलता जा रहा था। ऐसे में माता सीता ने आसपास मौजूद चीजों से ही पिंड बनाने का फैसला किया। फल्गु नदी के किनारे उन्हें रेत यानी बालू मिली। उन्होंने उसी बालू से पिंड बनाए और अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान किया। इसी वजह से गया में फल्गु नदी के किनारे पिंडदान की परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है।
कहा जाता है कि माता सीता ने अपने इस कार्य के साक्षी के रूप में फल्गु नदी, गाय, ब्राह्मण, कौआ, तुलसी और अक्षयवट को बनाया था। बाद में जब भगवान राम और लक्ष्मण वापस लौटे तो सीता ने उन्हें बताया कि वह दशरथ का पिंडदान कर चुकी हैं। राम को यह सुनकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि इस बात का प्रमाण कौन देगा कि वास्तव में पिंडदान हुआ था?
तब माता सीता ने उन सभी साक्षियों से सच बताने को कहा। पौराणिक कथा के अनुसार, अक्षयवट को छोड़कर बाकी साक्षियों ने माता सीता का साथ नहीं दिया। कहा जाता है कि इस बात से सीता क्रोधित हो गईं और उन्होंने झूठ बोलने वाले साक्षियों को अलग-अलग श्राप दे दिए।
लोकमान्यता के अनुसार, फल्गु नदी को माता सीता ने ऐसा श्राप दिया कि उसका जल सतह पर दिखाई नहीं देगा और वह ऊपर से सूखी नजर आएगी। आज भी फल्गु नदी के कई हिस्सों में ऊपर रेत दिखाई देती है जबकि उसके नीचे जलधारा मिलने की बात कही जाती है। इसी कारण फल्गु नदी को लेकर यह पौराणिक कथा लोगों के बीच आज भी काफी प्रसिद्ध है।
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