नई दिल्ली, 31 मई (आईएएनएस)। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी), जिसे करीब एक दशक तक पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए गेमचेंजर के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, अब एक ऐसी परियोजना बनकर रह गया है, जिसमें 'अधूरा बुनियादी ढांचा, बढ़ता कर्ज, रुके हुए औद्योगिक क्षेत्र और दोनों देशों के बीच बढ़ती निराशा' दिखाई दे रही है।
यूरोपियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, आज "सीपीईसी 2.0" की ब्रांडिंग किसी नई शुरुआत का संकेत कम और एक ऐसी परियोजना को राजनीतिक रूप से बचाने का प्रयास ज्यादा है, जो अपने रणनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने में विफल रही है।
करीब 62 अरब डॉलर मूल्य वाले सीपीईसी के मूल ढांचे में पाकिस्तान भर में फैले राजमार्ग, बिजली संयंत्र, रेल नेटवर्क, बंदरगाह विकास और विशेष आर्थिक क्षेत्र शामिल थे। चीन की बेल्ट एंड रोड पहल की इस प्रमुख परियोजना का उद्देश्य औद्योगिक बदलाव, क्षेत्रीय संपर्क, ऊर्जा सुरक्षा और ग्वादर को एक बड़े व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित करना था, जो पश्चिमी चीन को अरब सागर से जोड़ सके।
हालांकि रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआत से ही इस मॉडल में खामियां थीं क्योंकि इसमें दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता की बजाय दिखने वाले बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दी गई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर चीनी वित्तपोषण और निर्माण क्षमता तो हासिल कर ली, लेकिन वह ऐसा औद्योगिक ढांचा तैयार नहीं कर पाया जो लंबे समय तक आर्थिक लाभ दे सके। केवल सड़कें और बंदरगाह विकास नहीं ला सकते, जब तक वे उत्पादक उद्योगों, स्थिर निर्यात और प्रभावी प्रशासनिक व्यवस्था से नहीं जुड़े हों।
चीन-समर्थित कई कोयला और बिजली परियोजनाएं ऐसे समझौतों के तहत लागू की गईं, जिनमें चीनी कंपनियों को डॉलर में ऊंचा रिटर्न सुनिश्चित किया गया था। जैसे-जैसे पाकिस्तान की मुद्रा कमजोर हुई और आर्थिक संकट गहराता गया, ये समझौते और महंगे साबित होने लगे।
रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 तक पाकिस्तान के सर्कुलर डेट संकट के कारण चीनी बिजली उत्पादक कंपनियों का अरबों डॉलर का भुगतान बकाया रह गया। केवल चीनी स्वतंत्र बिजली उत्पादकों का बकाया ही 7 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया था। पाकिस्तान के बिजली क्षेत्र की संरचनात्मक समस्याओं को हल करने के बजाय सीपीईसी ने पहले से कमजोर व्यवस्था पर वित्तीय बोझ और बढ़ा दिया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान का भुगतान संतुलन संकट, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ बार-बार बातचीत और विदेशी मुद्रा की कमी ने यह उजागर कर दिया कि यह गलियारा मॉडल वास्तव में कितना कमजोर था।
रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी ऋण और निवेश से बुनियादी ढांचा तो बना, लेकिन उससे इतना निर्यात नहीं बढ़ सका कि कर्ज चुकाने की क्षमता विकसित हो सके। निर्माण और आर्थिक उत्पादकता के बीच यही अंतर सीपीईसी की सबसे बड़ी समस्या बन गया।
रिपोर्ट में ग्वादर बंदरगाह की विफलता को भी प्रमुख कारण बताया गया है। मूल योजना के तहत ग्वादर को दुबई या सिंगापुर की तरह वैश्विक व्यापार का बड़ा केंद्र बनाना था, लेकिन यह लक्ष्य पूरा नहीं हो सका।
साथ ही, सीपीईसी के आसपास की सुरक्षा स्थिति में भी तेजी से गिरावट आई है। रिपोर्ट के अनुसार, विशेष रूप से बलूचिस्तान में चीनी इंजीनियर और कर्मचारी लगातार उग्रवादी हमलों का निशाना बन रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बलूचिस्तान के विद्रोही समूह इस गलियारे को स्थानीय लोगों को वास्तविक आर्थिक लाभ दिए बिना बाहरी संसाधन दोहन की परियोजना के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि क्षेत्र में विरोध और सुरक्षा चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं।
--आईएएनएस
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