नई दिल्ली, 30 अक्टूबर (आईएएनएस)। चीन+1 रणनीति के बीच वैश्विक उद्योग का बदलता परिदृश्य भारत और आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन) के लिए बड़े अवसर प्रस्तुत कर रहा है। दोनों पक्ष निवेश आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा को साझा उत्पादन रणनीति में बदल सकते हैं। इससे न केवल वे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए चीन के विकल्प के रूप में उभरेंगे, बल्कि इंडो-पैसिफिक अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण विनिर्माण केंद्रों में से एक भी बन सकते हैं। यह जानकारी एक लेख में दी गई।
इंडिया नैरेटिव के लेख के अनुसार, चीन+1 रणनीति को भारत-आसियान की साझा उत्पादन रणनीति के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
इकोनॉमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर आसियान एंड ईस्ट एशिया (ईआरआईए) के एक अध्ययन से पता चलता है कि वैश्विक उत्पादन नेटवर्क के साथ आसियान का जुड़ाव अपेक्षाकृत मजबूत है, जबकि वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भारत का एकीकरण अभी और बेहतर हो सकता है।
लेख में कहा गया है कि यह अध्ययन क्षेत्रीय सीमाओं के पार निवेश और विनिर्माण क्षेत्र में एक-दूसरे की क्षमताओं का लाभ उठाने के महत्व को रेखांकित करता है।
क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क सिद्धांत के नजरिए से देखें तो कंपनियां अलग-अलग स्थानों की खूबियों को मिलाकर काम करती हैं तो आर्थिक लाभ अधिक होता है। भारत के पास बड़ा घरेलू बाजार, तकनीकी क्षमताएं और व्यापक औद्योगिक एवं श्रम आधार है। वहीं, आसियान के पास आपूर्तिकर्ताओं का नेटवर्क, बंदरगाह, औद्योगिक क्षेत्र, निर्यात का अनुभव और पूर्वी एशिया तथा प्रशांत क्षेत्र के विभिन्न बाजारों तक पहुंच है।
लेख में कहा गया है कि यदि दोनों पक्ष स्वतंत्र रूप से काम करते हैं तो निवेश की दोहराव वाली गतिविधियों और समान उत्पादों में प्रतिस्पर्धा का जोखिम है। इसके विपरीत, यदि दोनों एक-दूसरे से जुड़ते हैं तो एक देश में कलपुर्जों का उत्पादन, दूसरे में उनका प्रसंस्करण और सबसे कुशल स्थान पर उनकी असेंबली की जा सकती है। इसके बाद क्षेत्रीय व्यापार नेटवर्क के माध्यम से उत्पादों का विपणन किया जा सकता है। यही केवल निवेश आकर्षित करने और सामूहिक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित करने के बीच का अंतर है।
भारत और आसियान को क्षेत्रीय सीमाओं के पार एक साझा आपूर्ति श्रृंखला का खाका तैयार करने की जरूरत है। इस खाके में प्राथमिकता वाले उद्योगों, आपूर्तिकर्ताओं की कमी, तकनीकी जरूरतों और प्रत्येक देश में उत्पादन के सबसे प्रतिस्पर्धी चरणों की पहचान होनी चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी, फार्मास्यूटिकल्स और औद्योगिक मशीनरी इसके लिए उपयुक्त शुरुआती क्षेत्र हो सकते हैं।
लेख के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच व्यापार समझौते का उद्देश्य मध्यवर्ती वस्तुओं और कलपुर्जों के व्यापार को आसान बनाना होना चाहिए। इसके अलावा, निवेश सहयोग को अलग-अलग देशों के निवेश आकर्षित करने के प्रयासों से आगे बढ़ाने की जरूरत है।
भारत को विनिर्माण क्षेत्र में अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत करनी होगी, नियामकीय नीतियों में निश्चितता लानी होगी, प्रौद्योगिकी साझेदारी के अवसर पैदा करने होंगे और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए अपने घरेलू बाजार का लाभ उठाना होगा। लेख में कहा गया है कि भारत डिजाइन, इंजीनियरिंग, औद्योगिक सॉफ्टवेयर और चुनिंदा कलपुर्जों के उत्पादन के केंद्र के रूप में भी उभर सकता है।
वहीं, आसियान को अपने सदस्य देशों के बीच संपर्क व्यवस्था मजबूत करने, मानकों में एकरूपता लाने और औद्योगिक क्षेत्रों एवं बंदरगाहों को भारत के आपूर्तिकर्ता नेटवर्क से जोड़ने की जरूरत है।
लेख में कहा गया है कि इंडोनेशिया महत्वपूर्ण खनिजों, बैटरी सामग्री और डाउनस्ट्रीम औद्योगिक विकास में योगदान दे सकता है। मलेशिया सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र को मजबूत कर सकता है, थाईलैंड ऑटोमोबाइल विनिर्माण में और वियतनाम इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण एवं निर्यात नेटवर्क में अहम भूमिका निभा सकता है।
--आईएएनएस
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