नई दिल्ली, 26 अगस्त (आईएएनएस)। देश के कई हिस्सों में एच1एन1 यानी स्वाइन फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। ऐसे में लोगों के मन में कई सवाल हैं। क्या यह कोरोना जैसा खतरनाक है, इसके लक्षण क्या हैं, कब टेस्ट जरूरी है और किन लोगों को वैक्सीन लगवानी चाहिए? इन तमाम सवालों पर पद्म भूषण पुरस्कार विजेता, आईसीएमआर के पूर्व महानिदेशक, माइक्रोबायोलॉजिस्ट और ट्रॉपिकल बीमारियों के विशेषज्ञ प्रोफेसर निर्मल कुमार गांगुली ने आईएएनएस से खास बातचीत की।
प्रोफेसर गांगुली ने बताया कि इन्फ्लुएंजा वायरस कोई नया वायरस नहीं है। यह लंबे समय से इंसानों के बीच मौजूद है और समय-समय पर इसके अलग-अलग स्ट्रेन सामने आते रहते हैं। इन्फ्लुएंजा वायरस मुख्य रूप से टाइप ए और टाइप बी में बांटे जाते हैं। एच1एन1, इन्फ्लुएंजा ए वायरस का एक स्ट्रेन है। वायरस के अलग-अलग स्ट्रेन जानवरों और पक्षियों में भी पाए जाते हैं। सूअर और प्रवासी पक्षी इसके प्राकृतिक होस्ट माने जाते हैं। हालांकि, इंसानों में इस समय फैल रहा एच1एन1 मुख्य रूप से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संक्रमण के जरिए फैलता है।
एच1एन1 मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या सांस लेने के दौरान निकलने वाली बूंदों के जरिए फैल सकता है। बंद और भीड़भाड़ वाली जगहों पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, संक्रमित लोगों को छूने और फिर बिना हाथ धोए आंख, नाक या मुंह छूने से भी संक्रमण फैल सकता है।
इन्फ्लुएंजा वायरस ज्यादातर मानसून या जनवरी-फरवरी के महीने में ज्यादा लोगों को संक्रमित करता है। इसलिए फ्लू के मौसम में स्कूल, कॉलेज, सिनेमा हॉल, भीड़भाड़ वाले कार्यक्रमों और बंद जगहों पर अतिरिक्त सावधानी बरतना बेहतर है। अगर ऐसी जगहों पर जाना जरूरी हो तो मास्क का इस्तेमाल भी मददगार हो सकता है।
एच1एन1 के लक्षण कई दूसरे वायरल संक्रमणों जैसे ही हो सकते हैं। इनमें बुखार, नाक बहना, खांसी, गले में परेशानी, शरीर में दर्द, कमजोरी और थकान प्रमुख हैं। कई लोगों को ऐसा महसूस होता है कि शरीर में बिल्कुल जान नहीं बची है। ज्यादातर स्वस्थ लोगों में संक्रमण सामान्य फ्लू की तरह रह सकता है और आराम, पर्याप्त पानी और सामान्य देखभाल से ठीक हो जाता है। कुछ लोगों में यह गंभीर रूप ले सकता है और निमोनिया जैसी समस्या पैदा कर सकता है।
प्रोफेसर गांगुली के अनुसार, 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग और पांच साल से कम उम्र के बच्चे फ्लू के गंभीर संक्रमण के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील होते हैं। इसके अलावा जिन लोगों को पहले से कोई बीमारी है, उन्हें भी विशेष सावधानी रखनी चाहिए। इनमें डायबिटीज, हृदय संबंधी बीमारी, क्रोनिक किडनी डिजीज, डायलिसिस कराने वाले मरीज, कैंसर और कीमोथेरेपी ले रहे मरीज, अंग प्रत्यारोपण करा चुके लोग और कमजोर इम्युनिटी वाले मरीज शामिल हैं। ऐसे लोगों में अगर फ्लू जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
उनका कहना है कि अगर फ्लू के ज्यादातर मामले एक ही स्ट्रेन के कारण सामने आ रहे हों और व्यक्ति में सामान्य फ्लू जैसे लक्षण हों, तो हर मरीज का टेस्ट कराना जरूरी नहीं है। ऐसे मामलों में मरीज घर पर आराम कर सकता है, पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ ले सकता है और डॉक्टर की सलाह के अनुसार बुखार आदि के लिए दवा ले सकता है। लेकिन, अगर सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, ऑक्सीजन लेवल कम होना, लगातार तेज बुखार या हालत बिगड़ने जैसे संकेत दिखाई दें तो तुरंत अस्पताल जाना चाहिए। ऐसे मरीजों में टेस्ट और चिकित्सकीय निगरानी की जरूरत पड़ सकती है।
वहीं, बीमारी की निगरानी यानी सर्विलांस के लिए टेस्टिंग और सीक्वेंसिंग बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह पता लगाया जाता है कि वायरस का कोई नया स्ट्रेन या म्यूटेशन तो सामने नहीं आ रहा।
प्रोफेसर गांगुली ने कहा कि एच1एन1 और कोविड-19 दोनों श्वसन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं और दोनों में बुखार, खांसी, कमजोरी और निमोनिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। दोनों वायरस अलग-अलग परिवारों से आते हैं और उनकी जैविक संरचना अलग है। कोविड-19 में कुछ मरीजों में हृदय और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं ज्यादा देखने को मिली थीं, जबकि सामान्य इन्फ्लुएंजा में ऐसी जटिलताएं उसी स्तर पर आम नहीं हैं। हालांकि, दोनों ही संक्रमणों में गंभीर स्थिति में निमोनिया हो सकता है। एच1एन1 के इलाज में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख एंटीवायरल दवा ओसेल्टामिविर है।
प्रोफेसर गांगुली ने बताया कि यह इन्फ्लुएंजा वायरस में काम करती है, कोविड-19 में नहीं। इसका असर बीमारी के शुरुआती चरण में, खासकर लक्षण शुरू होने के करीब 48 घंटे के भीतर शुरू करने पर ज्यादा प्रभावी माना जाता है।
यह प्रिस्क्रिप्शन ड्रग है, इसलिए इसे खुद से मेडिकल स्टोर से लेकर खाने के बजाय डॉक्टर की सलाह पर ही लेना चाहिए। फ्लू से बचाव के लिए वैक्सीन उपलब्ध हैं। खासकर बुजुर्गों, बच्चों और कोमॉर्बिडिटी वाले मरीजों को डॉक्टर की सलाह से वैकसीन जरूर लेनी चाहिए। युवाओं के लिए वैकसीन लगवाना ज्यादा जरूरी नहीं है।
--आईएएनएस
पीआईएम/एबीएम