गुलाम मोहम्मद शेख: कभी 50 रुपए पर करते थे गुजारा, चित्रकारी से कहानियों के भीतर कहानियां और फिर गढ़ी 'दुनिया के भीतर दुनिया'

गुलाम मोहम्मद शेख: कभी 50 रुपए पर करते थे गुजारा, चित्रकारी से कहानियों के भीतर कहानियां और फिर गढ़ी 'दुनिया के भीतर दुनिया'

नई दिल्ली, 15 फरवरी (आईएएनएस)। गुलाम मोहम्मद शेख भारतीय समकालीन कला की एक ऐसी हस्ती हैं, जिनकी कूची में स्मृति, इतिहास और आत्मचिंतन एक साथ सांस लेते हैं। गुजरात के छोटे कस्बे से निकलकर बड़ौदा की फैकल्टी ऑफ फाइन आर्ट्स तक और फिर इंग्लैंड की कलायात्रा तक पहुंचे शेख ने अपने जीवन को मानो कई संसारों में जीया है और उन्हीं संसारों के भीतर नए संसार रचे हैं।

16 फरवरी 1937 को जन्मे गुलाम मोहम्मद शेख की कहानी गुजरात के सुरेंद्रनगर से शुरू होती है। भारत के इतिहास और राजनीतिक चेतना में गहराई से रचे-बसे शेख ने अपने छात्र से गुरु और चित्रकार से उस्ताद कलाकार बनने तक के सफर को तय किया।

उनकी शुरुआती दिनों की कुछ पेंटिंग्स 1955 के क्षणों को भी याद कराती हैं, जब 18 साल की उम्र में वे बड़ौदा विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय के द्वार पर झिझकते हुए भी आशा से भरे हुए खड़े थे। सुरेंद्रनगर, वह छोटा सा शहर जहां उन्होंने अपने प्रारंभिक वर्ष बिताए थे, एक अलग ही दुनिया जैसा लग रहा था। वे एक अनजान भविष्य में कदम रख रहे थे, अपने बचपन को पीछे छोड़कर एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे थे जिसकी उन्होंने शायद ही कभी कल्पना की हो।

अपने शिक्षकों, संस्थानों, दोस्तों यानी छात्रों और अपने सहपाठियों के साथ एक साल के भीतर ही उन्हें एहसास हो चुका था कि वे एक बिल्कुल नई दुनिया में प्रवेश कर चुके हैं, जो उनके लिए मानो एक दूसरी दुनिया थी।

वे एक अनजान भविष्य में कदम रख रहे थे। अपने बचपन को पीछे छोड़कर एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहे थे जिसकी उन्होंने शायद ही कभी कल्पना की हो। बड़ौदा में बिताए उनके वर्ष ज्ञानवर्धक और चुनौतीपूर्ण दोनों थे। वे छात्रवृत्ति प्राप्त छात्र थे और 50 रुपए प्रति माह पर अपना गुजारा करते थे, लेकिन किस्मत ने तब साथ दिया जब उनके शिक्षक ने उन्हें स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करते समय ही शिक्षण का पद प्रदान कर दिया। 250 रुपए का वेतन किसी वरदान से कम नहीं था, हालांकि इसके साथ जिम्मेदारी का भार भी जुड़ा हुआ था।

शेख के शिक्षक ने उनसे कहा था, 'यहां पढ़ाओ और वहां सीखो,' और उन्हें एक छात्र और एक मार्गदर्शक के रूप में अपनी भूमिकाओं को संतुलित करने का मार्गदर्शन दिया था। कलाकार का दिल अपनी जड़ों से जुड़ा रहा। उनके पिता ने उनकी कलात्मक रुचियों पर कभी सवाल नहीं उठाया, बल्कि उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया। उनके भाई-बहनों में से कोई भी विश्वविद्यालय नहीं गया था। उनके पिता के अटूट विश्वास ने उन्हें आगे बढ़ने में मदद की। गुलाम मोहम्मद शेख के जीवन के इन पहलुओं का जिक्र उनके इंटरव्यू और समाचार लेखों में मिलता है।

जीवनभर शेख हाथ में पकड़ने वाले कागज से लेकर वास्तुशिल्पीय पैमाने तक के विभिन्न प्रारूपों पर चित्रकारी करते रहे हैं, ताकि वे जिस दुनिया को जानते हैं, देखते हैं और खोजते हैं, उसे अपने जीवन में उतार सकें। जीवन के शुरुआती वर्षों की यादें, सुनी-सुनाई कहानियां और बचपन से जुड़े मिथक, सबसे पहले कविता में और बाद में चित्रकला में अभिव्यक्त हुए। एक तरीके से कला का अभ्यास और अनुभव जीवन के हर सुख-दुख में उनका सहारा रहा है।

गुलाम मोहम्मद शेख की साहित्यिक संवेदनशीलता उनकी कलात्मक संवेदनशीलता के समान ही उत्कृष्ट है। उनका मानना है कि लेखन और चित्रकला के बीच एक गहरा संबंध है। हमारी चित्रकला परंपरा इससे ओतप्रोत रही है, लेकिन अब हमने एक शुद्धतावादी शैली विकसित कर ली है, जिसमें हमने इन दोनों को अलग कर दिया है। यह ऐसा कहने जैसा है कि देखते समय कान बंद कर लो, सुनते समय आंखें बंद कर लो। ऐसा नहीं है। आप ऐसा कर ही नहीं सकते। जिन लोगों ने बोध का अध्ययन किया है, वे इंद्रियों के बीच के संबंध को समझ पाएंगे।

--आईएएनएस

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