नई दिल्ली, 23 मई (आईएएनएस)। बछेंद्री पाल का जन्म 24 मई 1954 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के एक बेहद खूबसूरत लेकिन दुर्गम पहाड़ी गांव नकुरी' में हुआ। दिलचस्प बात यह है कि उनका जन्म सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे द्वारा एवरेस्ट फतह करने की पहली वर्षगांठ से ठीक पांच दिन पहले हुआ था।
उनका परिवार पारंपरिक भोटिया समुदाय से था। 'भोटिया' मुख्य रूप से भारत के हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाली एक प्रमुख और प्राचीन जनजाति है।
उनके पिता किशन सिंह पाल एक सीमांत व्यापारी थे, जो खच्चरों और बकरियों पर आटा-चावल लादकर तिब्बत ले जाते थे। उनकी मां हंसा देवी घर संभालने के साथ-साथ कालीन बुनकर परिवार का हाथ बंटाती थीं। साल 1943 की विनाशकारी बाढ़ ने उनके पैतृक गांव हर्षिल को उजाड़ दिया था, जिससे परिवार को भारी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा।
बछेंद्री पाल बचपन से ही लीक से हटकर चलने वाली लड़की थीं। मात्र 12 साल की उम्र में उन्होंने स्कूल पिकनिक के दौरान बिना किसी तैयारी और उपकरणों के लगभग 13,000 फीट ऊंची पहाड़ी पर चढ़ाई कर दी थी। उस रात वे अपनी सहेलियों के साथ पहाड़ पर ही फंसी रहीं। घर लौटने पर उन्हें शाबाशी की जगह डांट मिली। जब उन्होंने देखा कि उनके भाइयों को पहाड़ों पर जाने के लिए बढ़ावा दिया जाता है और लड़कियों को सिर्फ चूल्हा-चौका करने की सलाह दी जाती है, तो उनके मन में लड़कों से बेहतर करके दिखाने की चिंगारी सुलगी।
तंगहाली के बावजूद बछेंद्री पाल ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। परिवार और समाज के विरोध के बीच उन्होंने संस्कृत में एमए और बीएड की डिग्री हासिल की। अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए वह रात-रात भर कपड़े सिलाई का काम करती थीं। वे अपने गांव की पहली महिला स्नातक बनीं।
उन्होंने उत्तरकाशी के 'नेहरू पर्वतारोहण संस्थान' (एनआईएम) में दाखिला लिया। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने गंगोत्री प्रथम और माउंट रुद्रगैरा जैसी बेहद कठिन चोटियों को लांघकर यह साबित कर दिया कि वे एक असाधारण पर्वतारोही हैं।
भारतीय एवरेस्ट अभियान 1984 में चुनी गईं बछेंद्री पाल के लिए यह यात्रा सिर्फ एक चढ़ाई नहीं, बल्कि देश की करोड़ों महिलाओं के सपनों की उड़ान थी। रास्ते में उन्होंने शेरपा कुली की मौत का दर्द झेला और कैंप के उस भयानक हिमस्खलन का सामना किया जिसने अच्छे-अच्छे साहसी पुरुषों के हौसले तोड़ दिए थे।
23 मई 1984 को जब वे 26,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित साउथ कोल कैंप पहुंचीं, तो वे अंतिम चढ़ाई दल में एकमात्र महिला बची थीं। 23 मई की सुबह कड़ाके की ठंड (-30°C से -40°C) और 100 किमी/घंटा की बर्फीली आंधी के बीच उन्होंने सिरदार आंग दोरजे के साथ अपनी आखिरी चढ़ाई शुरू की।
दोपहर में बछेंद्री पाल ने उस शिखर पर कदम रखा, जहां पहुंचने का सपना हर पर्वतारोही देखता है। वे माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली देश की पहली और दुनिया की पांचवीं महिला बन गईं।
बछेंद्री पाल की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि उन्होंने अपनी सफलता को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा। दिसंबर 1983 में टाटा स्टील ने उनके हुनर को पहचाना और उन्हें खेल विभाग में शामिल किया। बाद में 'टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन' (टीएसएएफ) के निदेशक के रूप में उन्होंने तीन दशकों तक हजारों युवाओं को जीवन कौशल और नेतृत्व की सीख दी।
उन्होंने समाज के सबसे पिछड़े, ग्रामीण और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों की प्रतिभा को पहचाना। उनके मार्गदर्शन में अरुणिमा सिन्हा (ट्रेन हादसे में पैर गंवाने वाली नेशनल वॉलीबॉल खिलाड़ी) ने कृत्रिम पैर के साथ एवरेस्ट फतह कर इतिहास रचा।
भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री (1984) और पद्म भूषण (2019) जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से नवाजा।
--आईएएनएस
वीकेयू/डीकेपी