ढाका, 14 अगस्त (आईएएनएस)। बांग्लादेश में हर साल 15 अगस्त को 'राष्ट्रीय शोक दिवस' मनाया जाता है। इस दिन देश के संस्थापक और राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की उनके परिवार के सदस्यों के साथ हत्या कर दी गई थी। 14 अगस्त 1975 को ढाका स्थित उनके आवास पर एक सैन्य हमले में उनकी और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की निर्मम हत्या कर दी गई थी। शेख मुजीबुर रहमान को बंगबंधु भी कहा जाता है, जिसका अर्थ बंगाल का मित्र होता है।
इस दिन को देश के संस्थापक के बलिदान और योगदान को याद करने के लिए 1996 से आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया।
शेख मुजीबुर रहमान ने 1948 से ही पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली भाषा और संस्कृति के अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किया। 1971 में 7 मार्च को सोहरावर्दी उद्यान में दिए गए उनके ऐतिहासिक भाषण ने लाखों बंगालियों को मुक्ति संग्राम के लिए प्रेरित किया। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र बना और शेख मुजीब उसके पहले राष्ट्रपति बने।
हालांकि, पाकिस्तान से आजादी के महज साढ़े तीन साल बाद 15 अगस्त 1975 की रात कुछ सेना अधिकारियों ने उनके धनमंडी स्थित घर पर हमला कर दिया। इस हमले में शेख मुजीबुर रहमान, उनकी पत्नी शेख फजिलातुन्नेसा मुजीब, बेटे शेख कमाल, शेख जमाल, शेख रसेल और बहुएं सहित 18 परिवार के सदस्य मारे गए। उस समय उनकी दो बेटियां शेख हसीना और शेख रेहाना विदेश में थीं, इसलिए बच गईं।
1981 से 15 अगस्त को राष्ट्रीय शोक दिवस के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। 1996 में जब आवामी लीग सत्ता में आई तो इस दिन को सरकारी अवकाश घोषित किया गया। हालांकि, 2024 में बांग्लादेश में भारी हिंसा के बीच शेख हसीना की सरकार गिराई गई। इसके बाद देश में मुहम्मद युनूस की अंतरिम सरकार ने देश की कमान संभाली। युनूस के नेतृत्व में कुछ समय के लिए राष्ट्रीय शोक दिवस के इस अवकाश को हटाया गया था, लेकिन भारी विरोध के बाद इसे फिर से बहाल कर दिया गया।
राष्ट्रीय शोक दिवस का दिन बांग्लादेश के लोकतंत्र, संविधान और मुक्ति संग्राम की भावना को याद करने का भी दिन है। इस दिन राजनीतिक दलों के अलावा नागरिक समाज, सांस्कृतिक संगठन और छात्र संगठन भी विभिन्न कार्यक्रम करते हैं।
शेख मुजीबुर रहमान का नारा था 'एबारेर संग्राम मुक्तिर संग्राम, एबारेर संग्राम स्वाधीनतार संग्राम'। आज भी लाखों बांग्लादेशी उसी आदर्श पर चलने का संकल्प लेते हैं।
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