वन अग्नि सुरक्षा सप्ताह: एक घटना से हमारी तैयारी सशक्त, अंतरिक्ष से भी जमीन पर कड़ी नजर

वन अग्नि सुरक्षा सप्ताह: एक घटना से हमारी तैयारी सशक्त, अंतरिक्ष से भी जमीन पर कड़ी नजर

नई दिल्ली, 31 जनवरी (आईएएनएस)। भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत का लगभग 36 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र बार-बार लगने वाली आग के प्रति संवेदनशील है। इनमें से लगभग 4 प्रतिशत वन क्षेत्र अत्यधिक और 6 प्रतिशत बहुत अधिक आग लगने की संभावना वाले क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृत हैं।

भारतीय अग्नि सुरक्षा का इतिहास एक दर्दनाक लेकिन गौरवशाली अध्याय से जुड़ा है। बात 14 अप्रैल 1944 की है, जब मुंबई के विक्टोरिया डॉक में खड़ा जहाज 'एसएस फोर्ट स्टिकिन' धमाकों से दहल उठा था। कपास, सोने और विस्फोटकों से लदे इस जहाज की आग बुझाते हुए 66 जांबाज अग्निशामकों ने अपनी जान न्यौछावर कर दी थी। आज उन्हीं की याद में हम 'राष्ट्रीय अग्निशमन सेवा दिवस' मनाया जाता हैं।

दरअसल, भारत में 15 फरवरी से 15 जून तक का समय 'फायर सीजन' कहलाता है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में फरवरी के पहले हफ्ते को ही 'वन अग्नि सुरक्षा सप्ताह' के रूप में मनाया जाता है।

एक तथ्य यह भी है कि भारत में लगने वाली 90 प्रतिशत वनाग्नि मानवीय गतिविधियों का नतीजा होती है। चाहे वह महुआ चुनने के लिए जलाई गई छोटी सी आग हो या चरवाहों की अनजाने में की गई गलती। 'नेशनल एक्शन प्लान ऑन फॉरेस्ट फायर' (एनएपीएफएफ) अब इसी सोच को बदल रहा है। यह 2018 में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य वन-सीमावर्ती समुदायों को सक्षम बनाकर, आधुनिक तकनीक का उपयोग करके और वन कर्मियों की क्षमता बढ़ाकर देश में वनाग्नि की घटनाओं को न्यूनतम करना और जंगल की आग से प्रभावित क्षेत्रों को तेजी से पुनर्जीवित करना है।

उत्तर प्रदेश ने इस दिशा में एक मिसाल पेश की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य ने अग्निशमन के लिए 184 करोड़ रुपए का आधुनिक बजट आवंटित किया है। अब हमारे अग्निशामक केवल पानी की पाइपों पर निर्भर नहीं हैं। उनके पास 'आर्टिक्युलेटिंग वॉटर टावर' हैं जो ऊंची इमारतों और घने जंगलों के मुहाने तक पहुंच सकते हैं। तंग गलियों के लिए 135 इमरजेंसी मोटर बाइक और त्वरित रिस्पांस के लिए 75 विशेष वाहन तैनात हैं।

सिर्फ जमीन पर ही नहीं, आसमान से भी नजर रखी जा रही है। भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) का 'वन अग्नि' पोर्टल उपग्रहों के जरिए बीट स्तर तक आग के अलर्ट भेजता है। 2004 में जहां हम सिर्फ ईमेल पर निर्भर थे, आज एसएनपीपी-वीआईआईआरएस सेंसर के जरिए 375 मीटर तक के छोटे अग्नि बिंदुओं को भी मिनटों में पहचान लिया जाता है।

जंगल के भीतर आग को रोकने के लिए 'फायर लाइन्स' बनाई जाती हैं। यानी जमीन की ऐसी पट्टियां जहां से वनस्पति को पूरी तरह साफ कर दिया जाता है। ये पट्टियां 3 मीटर से लेकर 30 मीटर तक चौड़ी हो सकती हैं। इसके अलावा, अब हम 'हरित अग्नि अवरोधक' का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें आग प्रतिरोधी पौधों को दीवार की तरह उगाया जाता है।

यह इस लड़ाई का सबसे मानवीय पहलू है। हिमालयी राज्यों में चीड़ की गिरती पत्तियां आग का सबसे बड़ा कारण बनती हैं। अब सरकार महिला स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहित कर रही है कि वे इन पत्तियों को इकट्ठा कर उनसे 'ब्रिकेट' (जैव-ईंधन), फर्नीचर और वर्मी-कम्पोस्ट बनाएं।

जंगल के करीब रहने वालों के लिए 'होम इग्निशन जोन'की रणनीति अपनाई गई है। इस बात को दिमाग में जरूर रखे कि एक जलती हुई सिगरेट या आधा बुझा कैंपफायर लाखों पेड़ों की मौत का कारण बन सकता है। वनाग्नि प्रबंधन अब सिर्फ एक प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ हमारी जंग का अहम हिस्सा भी है।

--आईएएनएस

वीकेयू/डीकेपी