राष्ट्रीय बालिका दिवस: भारत की बेटियां लिख रही हैं नई तकदीर, कोडिंग से कॉकपिट तक भर रही उड़ान

राष्ट्रीय बालिका दिवस: कैसे भारत की बेटियां लिख रही हैं नई तकदीर, कोडिंग से कॉकपिट तक भर रही उड़ान

नई दिल्ली, 23 जनवरी (आईएएनएस)। 24 जनवरी 1966 का दिन आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों से दर्ज है। उस दिन दिल्ली के रायसीना हिल्स पर राजनीतिक हलचल अपने चरम पर थी। दृढ़ संकल्प और अटूट आत्मविश्वास से भरी एक महिला भारत के सर्वोच्च पद की शपथ लेने जा रही थी। यह थीं इंदिरा गांधी उस दिन दुनिया ने देखा कि भारत की एक बेटी न केवल घर संभाल सकती है, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व भी कर सकती है।

इसी ऐतिहासिक उपलब्धि को सम्मान देने के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 2008 में 24 जनवरी को ‘राष्ट्रीय बालिका दिवस’ के रूप में घोषित किया। वर्ष 2026 में प्रवेश के साथ यह दिन अब केवल कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं रह गया है, बल्कि देश की करोड़ों बालिकाओं के सपनों, आत्मविश्वास और संभावनाओं के उत्सव का प्रतीक बन चुका है।

यदि आंकड़ों की बात करें तो देश ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। एक समय था जब लिंगानुपात गिरकर 927 तक पहुंच गया था, जो गंभीर चिंता का विषय था। लेकिन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नवीनतम आंकड़े आशा जगाते हैं। आज भारत में प्रति एक हजार पुरुषों पर 1020 महिलाओं का अनुपात दर्ज किया गया है, जो सामाजिक सोच में आ रहे सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत करता है। हालांकि, चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। 'जन्म के समय लिंगानुपात' अब भी 930 के आसपास है।

जनवरी 2015 में हरियाणा की धरती से शुरू हुआ 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान आज अपनी सफलता के 11वें साल में है। इसने केवल नीतियां नहीं बदलीं, बल्कि समाज का 'नजरिया' बदला है। जो राज्य कभी 'बेटियों के लिए असुरक्षित' माना जाता था, आज वहां का लिंगानुपात 923 के पार पहुंच चुका है। 'कन्या शिक्षा प्रवेश उत्सव' ने उन एक लाख से अधिक लड़कियों को वापस स्कूल पहुंचाया, जिन्होंने बीच में पढ़ाई छोड़ दी थी।

'सुकन्या समृद्धि योजना' के 4.53 करोड़ से अधिक खाते इस बात का प्रमाण हैं कि अब बेटी की शादी और पढ़ाई माता-पिता के लिए 'बोझ' नहीं, बल्कि एक 'नियोजित निवेश' है। 8.2 प्रतिशत की ब्याज दर के साथ, यह योजना बेटियों को उनकी वयस्कता की दहलीज पर एक मजबूत वित्तीय ढाल दे रही है।

आज की बेटी केवल चूल्हा-चौका तक सीमित नहीं है। वह कोडिंग कर रही है, रोबोटिक्स सीख रही है, और अंतरिक्ष के सपने देख रही है। 'उड़ान' जैसी परियोजनाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों की मेधावी लड़कियों को इंजीनियरिंग की राह दिखाई है। हालांकि एसटीईएम (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित) में अभी केवल 18 प्रतिशत लड़कियां हैं, लेकिन 'एआई फॉर ऑल' जैसे अभियानों से यह दूरी तेजी से सिमट रही है। 2026 के भारत में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) केवल लड़कों का तक सीमित नहीं रह गया है।

एक सशक्त राष्ट्र की नींव एक स्वस्थ बेटी ही रख सकती है। भारत में किशोरियों के बीच एनीमिया (रक्तअल्पता) एक बड़ी बाधा रही है। लगभग 59 प्रतिशत किशोरियां इससे जूझ रही हैं। सरकार का 'पोषण अभियान' और मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन अब स्कूलों और गांवों की चौपालों तक पहुंच चुका है। सैनिटरी पैड्स का वितरण और आयरन की गोलियां अब शर्म का विषय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का अधिकार बन चुकी हैं।

कानूनी तौर पर भारत ने अपनी बेटियों को एक अभेद्य सुरक्षा कवच दिया है। 'पॉक्सो' और 'बाल विवाह निषेध अधिनियम' जैसे कानूनों ने अपराधियों में खौफ और बेटियों में आत्मविश्वास भरा है। नवंबर 2024 में शुरू हुआ 'बाल विवाह मुक्त भारत' अभियान 2030 तक इस कुप्रथा को जड़ से मिटाने के लिए संकल्पित है। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसलों ने भी स्पष्ट कर दिया है कि 18 साल से कम उम्र की बेटी के साथ किसी भी तरह का समझौता उसकी गरिमा के खिलाफ है।

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय बालिका दिवस को 'यूपी दिवस' के भव्य उत्सव के साथ मनाया जाता है, जहां स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं अपनी सफलता की गाथा सुनाती हैं।

राजस्थान में डीग जिले के भान्हेड़ी गांव जैसे उदाहरण बताते हैं कि कैसे फुटबॉल के मैदान में पसीना बहाती लड़कियां बाल विवाह जैसी बेड़ियों को तोड़ रही हैं।

सामाजिक सुधार में सरकारी प्रयासों के साथ-साथ संत रामपाल जी महाराज जैसे समाज सुधारकों के अनुयायियों द्वारा दहेज प्रथा और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान यह बताते हैं कि जब अध्यात्म और नीति मिलते हैं, तो बदलाव और भी गहरा होता है।

--आईएएनएस

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