श्रीनगर से भुवनेश्वर और आसनसोल तक, नए श्रम कानूनों के समर्थन में एनएफआईटीयू

राजनीति से प्रेरित है भारत बंद: श्रीनगर से भुवनेश्वर और आसनसोल तक नए श्रम कानूनों के समर्थन में उतरे एनएफआईटीयू कार्यकर्ता

नई दिल्ली, 12 फरवरी (आईएएनएस)। देशभर में गुरुवार को प्रस्तावित भारत बंद को लेकर ट्रेड यूनियनों के बीच मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। जहां कुछ केंद्रीय ट्रेड यूनियन हड़ताल के पक्ष में हैं, वहीं नेशनल फ्रंट ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (एनएफआईटीयू) ने इसका विरोध किया है। श्रीनगर, भुवनेश्वर और पश्चिम बंगाल के आसनसोल से संगठन के नेताओं ने नए श्रम कानूनों का समर्थन करते हुए हड़ताल को 'राजनीति से प्रेरित' बताया है।

श्रीनगर में कश्मीर लेबर यूनियन के अध्यक्ष और कंसेट (देश की बड़ी लेबर यूनियनों का संयुक्त मंच) के सदस्य अशरफ गनी ने कहा कि समय के साथ बदलाव जरूरी है और श्रम क्षेत्र में सुधार उसी दिशा में एक कदम है।

उन्होंने आईएएनएस से कहा, "वक्त के साथ बदलाव आना चाहिए। अब कार्यबल का काम करने का तरीका बदल चुका है। पहले गिग वर्कर्स और डिलीवरी बॉय जैसे नए रोजगार क्षेत्रों के लिए कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं थी। नए श्रम कोड का उद्देश्य ऐसे कामगारों को भी सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम वेतन और पारदर्शिता देना है।"

उन्होंने 'वन नेशन, वन लेबर लॉ' की अवधारणा का समर्थन करते हुए कहा कि चारों लेबर कोड का मुख्य लक्ष्य मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा देना, न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करना और व्यवस्था को पारदर्शी बनाना है।

उन्होंने कहा कि देश 2047 तक 'विकसित भारत' के विजन पर काम कर रहा है और इसके लिए जमीनी स्तर पर स्किल डेवलपमेंट और लेबर डेवलपमेंट बेहद जरूरी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार चर्चा के लिए तैयार है, तो हड़ताल की जरूरत क्यों पड़ रही है?

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में एनएफआईटीयू के प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत पाधी ने भी भारत बंद का विरोध किया। उन्होंने कहा कि गुरुवार की हड़ताल राजनीतिक रूप से प्रायोजित है और इससे मजदूरों का कोई भला नहीं होगा। हर साल 12 फरवरी को अलग-अलग मुद्दों पर कुछ संगठन हड़ताल करते रहे हैं। इस बार भी श्रम कानूनों का विरोध करके हड़ताल की जा रही है, लेकिन इससे मजदूरों को क्या फायदा होगा? एक दिन की मजदूरी गंवाने से उनके परिवार की रोजी-रोटी पर असर पड़ेगा।

प्रशांत पाधी ने औद्योगिक क्षेत्रों की स्थिति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई सार्वजनिक उपक्रमों और औद्योगिक क्षेत्रों में नियमित मजदूरों से ज्यादा संख्या में आउटसोर्सिंग के जरिए काम कराया जाता है, लेकिन उनके लिए पर्याप्त व्यवस्था और पारदर्शिता नहीं है। इसमें सुधार की जरूरत है और संगठन इस दिशा में सरकार से मांग कर रहा है।

उन्होंने सरकार से यह भी मांग की कि जहां-जहां नए उद्योग स्थापित हो रहे हैं, वहां स्थानीय बेरोजगार युवाओं को प्राथमिकता दी जाए।

प्रशांत पाधी ने आयुष्मान भारत योजना का जिक्र करते हुए कहा कि अभी सभी वर्गों के लोग इसका लाभ नहीं ले पा रहे हैं। जिनके पास राशन कार्ड या अन्य उपभोक्ता कार्ड नहीं हैं, वे इलाज के लिए योजना का लाभ नहीं उठा पाते। उन्होंने मांग की कि ऐसे लोगों को भी आयुष्मान योजना में शामिल किया जाए।

उन्होंने 'विकसित भारत - जी राम जी' का जिक्र करते हुए कहा कि हाल के बजट में इसके लिए एक लाख करोड़ रुपए से अधिक का प्रावधान किया गया है। पहले जहां 100 दिन का रोजगार मिलता था, अब इसे बढ़ाकर 125 दिन करने की बात हो रही है। उन्होंने कहा कि इसे और पारदर्शी बनाने के लिए भी सरकार को सुझाव दिए गए हैं।

पश्चिम बंगाल के आसनसोल में एनएफआईटीयू के प्रदेश अध्यक्ष बुंबा मुखर्जी ने भी हड़ताल का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा, "नेशनल फ्रंट ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस की ओर से हम गुरुवार की हड़ताल का पूर्ण रूप से विरोध करते हैं। यह हड़ताल पूरी तरह राजनीतिक रूप से प्रेरित है। कुछ यूनियनों ने अपना राजनीतिक लाभ साधने के लिए इसे बुलाया है।"

मुखर्जी ने कहा कि संगठन नए चार श्रम कोड का समर्थन करता है और केंद्रीय मंत्री मनसुख मांडविया के प्रयासों की सराहना करता है। संगठन के कार्यकर्ता जमीन पर उतरकर हड़ताल का विरोध करेंगे और श्रमिक भाइयों से अपील करेंगे कि वे उत्पादन जारी रखें। उन्होंने मजदूरों से अपील की, "हम सभी श्रमिक भाई-बहनों से अनुरोध करते हैं कि मिलकर काम जारी रखें और उत्पादन बंद न करें।"

--आईएएनएस

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