नई दिल्ली, 1 जनवरी (आईएएनएस)। रूस-जापान युद्ध के दौरान 'पोर्ट आर्थर' पर जापान की निर्णायक विजय को इतिहासकार केवल एक सैन्य घटना नहीं, बल्कि विश्व शक्ति संतुलन में आए बड़े बदलाव के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि 2 जनवरी 1905 की इस घटना का उल्लेख कई प्रसिद्ध पुस्तकों और ऐतिहासिक भाषणों में प्रतीकात्मक उदाहरण के रूप में किया गया है। पोर्ट आर्थर की हार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि आधुनिक युद्ध और संगठन के बल पर एक एशियाई राष्ट्र भी यूरोपीय साम्राज्य को पराजित कर सकता है।
2 जनवरी 1905 को एक निर्णायक घटना घटी। इसी दिन रूसी सेना ने पोर्ट आर्थर में जापानी बलों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह घटना न केवल युद्ध का टर्निंग पॉइंट बनी, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी दूरगामी प्रभाव छोड़ गई।
पोर्ट आर्थर, जो आज के चीन के ल्यूशुन क्षेत्र में स्थित है, उस समय रूस का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा था। रूस ने इसे प्रशांत महासागर में अपनी सैन्य शक्ति के प्रतीक के रूप में विकसित किया था। फरवरी 1904 में रूस–जापान युद्ध शुरू होते ही जापान का प्रमुख लक्ष्य पोर्ट आर्थर को अपने नियंत्रण में लेना था, क्योंकि इससे रूसी नौसेना को निर्णायक झटका दिया जा सकता था।
जापान ने 1904 के मध्य से ही पोर्ट आर्थर की कड़ी घेराबंदी शुरू कर दी थी। कई महीनों तक भीषण लड़ाई चली, जिसमें दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। जापानी सेना ने आधुनिक तोपखाने, खाइयों और रणनीतिक पहाड़ियों पर कब्जा कर धीरे-धीरे रूसी रक्षा पंक्तियों को कमजोर कर दिया। खासतौर पर 203 मीटर हिल पर जापान का कब्जा निर्णायक साबित हुआ, क्योंकि वहां से रूसी बंदरगाह और युद्धपोतों पर सीधा हमला संभव हो गया।
लगातार सैन्य दबाव, भारी हताहतों और रसद की कमी के कारण रूसी कमांडर 'जनरल अनातोली स्तेसेल' ने अंततः 2 जनवरी 1905 को पोर्ट आर्थर को जापान के हवाले करने का फैसला किया। इस आत्मसमर्पण के साथ ही रूस को युद्ध में बड़ा मनोवैज्ञानिक और सैन्य झटका लगा।
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ग्लिम्सेस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री” (विश्व इतिहास की झलक) में रूस-जापान युद्ध का उल्लेख करते हुए लिखा कि यह संघर्ष एशिया के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण था। नेहरू के अनुसार, जापान की जीत ने एशियाई देशों के भीतर यह विश्वास पैदा किया कि पश्चिमी शक्तियां अजेय नहीं हैं। उन्होंने इसे एशिया में उभरते राष्ट्रवाद और आत्मसम्मान की भावना से जोड़ा, जो आगे चलकर औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध आंदोलनों की प्रेरणा बना।
अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने भी रूस-जापान युद्ध और विशेष रूप से पोर्ट आर्थर के पतन को एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा। रूजवेल्ट, जिन्हें बाद में इसी युद्ध में मध्यस्थता की भूमिका के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिला, मानते थे कि पोर्ट आर्थर की हार ने रूस की साम्राज्यवादी छवि को गहरी चोट पहुंचाई।
पोर्ट आर्थर की घेराबंदी को आधुनिक युद्ध रणनीति का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। यह पहली बार था जब किसी एशियाई सेना ने यूरोपीय शैली की किलेबंदी और हथियारों को उसी के ढंग से चुनौती देकर पराजित किया। इसी संदर्भ में पोर्ट आर्थर को बीसवीं सदी के युद्ध इतिहास का एक निर्णायक अध्याय माना गया।
2 जनवरी 1905 की घटना केवल तारीखों और युद्ध विवरणों तक सीमित नहीं रही। यह एक प्रतीक बन गई, जो एशिया के उभार, उपनिवेशवाद के पतन और आधुनिक विश्व राजनीति की दिशा बदलने वाले क्षण को दर्शाती है।
--आईएएनएस
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