नई दिल्ली, 3 जुलाई (आईएएनएस)। भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे के रचनाकार पिंगली वेंकैया का नाम देश के इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है। 4 जुलाई 1963 को आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में इनका देहांत हुआ था। इन्होंने न केवल भारत को उसकी पहचान देने वाला ध्वज तैयार किया बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी होने के बावजूद उन्होंने राष्ट्र सेवा को अपना जीवन उद्देश्य बनाया।
पिंगली वेंकैया का जन्म 2 अगस्त 1876 को आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम हनुमंतरायुडु और माता का नाम वेंकटरत्नम्मा था। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने मछलीपट्टनम के हिंदू हाईस्कूल में प्राप्त की। बचपन कृष्णा जिले के विभिन्न स्थानों में बीता। हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने आगे की शिक्षा के लिए विदेश का रुख किया।
महज 19 वर्ष की उम्र में पिंगली वेंकैया ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सेनानायक बने। सेना में रहते हुए दक्षिण अफ्रीका के एंग्लो-बोअर युद्ध के दौरान उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। गांधी के विचारों से प्रभावित होकर वे भारत लौट आए और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हो गए।
पिंगली वेंकैया का मानना था कि भारत जैसे महान देश का अपना राष्ट्रीय ध्वज होना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी के सामने यह विचार रखा कि भारतीयों को विदेशी ब्रिटिश झंडे को सलाम नहीं करना चाहिए। गांधी ने उनके विचार से सहमति जताई और राष्ट्रीय ध्वज तैयार करने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी।
इसके बाद वर्ष 1916 से 1921 के बीच पिंगली वेंकैया ने दुनिया के विभिन्न देशों के झंडों का गहन अध्ययन किया। उन्होंने करीब 30 अलग-अलग डिजाइनों का प्रस्ताव तैयार किया, जिनमें से एक डिजाइन आगे चलकर भारत के तिरंगे का आधार बना। वर्ष 1931 में उनके डिजाइन को कुछ संशोधनों के साथ स्वीकार किया गया। सबसे ऊपर लाल रंग के स्थान पर केसरिया रंग रखा गया तथा बीच में चरखे का प्रतीक जोड़ा गया। इस प्रकार केसरिया, सफेद और हरे रंग वाला तिरंगा अस्तित्व में आया।
स्वतंत्रता से ठीक पहले 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसी ध्वज को भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार किया। इसके बाद में चरखे की जगह सम्राट अशोक के धर्मचक्र को शामिल किया गया, जो आज के तिरंगे की पहचान है।
देश को उसकी पहचान देने वाले पिंगली वेंकैया का सपना तो पूरा हुआ, लेकिन उन्हें जीवनकाल में वह सम्मान नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। 4 जुलाई 1963 को उनका निधन गुमनामी में हुआ। हालांकि, वर्ष 2009 में भारतीय डाक विभाग ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी कर उनके योगदान को याद किया।
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