कश्मीरी केसर से बनारसी साड़ी तक, परंपरा और संस्कृति के साथ देश की पहचान बने उत्तर भारत के ये 'जीआई' उत्पाद

कश्मीरी केसर से बनारसी साड़ी तक, परंपरा और संस्कृति के साथ देश की पहचान बने उत्तर भारत के ये 'जीआई' उत्पाद

नई दिल्ली, 27 मई (आईएएनएस)। उत्तर भारत के पारंपरिक उत्पाद आज देश की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर नई मजबूती दे रहे हैं। कश्मीर का केसर, हिमाचल की कुल्लू शॉल, उत्तर प्रदेश की बनारसी साड़ी, राजस्थान की ब्लू पॉटरी और उत्तराखंड की लोक कलाएं अब केवल स्थानीय उत्पाद नहीं रह गए, बल्कि गांव और छोटे शहरों से निकलकर ये जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) उत्पाद ग्लोबल मंच पर अपनी चमक बिखेर रहे हैं।

उत्तर भारत के जीआई उत्पाद देश की संस्कृति, परंपरा और आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं साथ ही नई पहचान के साथ स्थानीय कारीगरों, किसानों और हस्तशिल्प से जुड़े लोगों को आर्थिक मजबूती भी मिल रही है। दरअसल, भारत की असली पहचान उसकी विविधता, परंपरा और स्थानीय कला में बसती है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बनने वाले पारंपरिक उत्पाद न केवल भारतीय संस्कृति की झलक दिखाते हैं, बल्कि दुनिया भर में भारत की अलग पहचान भी बना रहे हैं।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेश दौरे के दौरान नीदरलैंड में जयपुर की ब्लू पॉटरी, मीनाकारी-कुंदन की बालियां, इटली के राष्ट्रपति सर्जियो मैटारेला को आगरा की पच्चीकारी कला से सजी संगमरमर पेटी भेंट की। आज जीआई टैग भारतीय उत्पादों को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने का सबसे मजबूत माध्यम बन चुका है। खास बात यह है कि उत्तर भारत के राज्यों ने इस गौरव को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है।

दरअसल, जीआई टैग किसी उत्पाद को उसके मूल भौगोलिक क्षेत्र की पहचान देता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि उस नाम का इस्तेमाल केवल वही उत्पादक कर सकें, जो उस क्षेत्र से जुड़े हों। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगती है, स्थानीय कारीगरों और किसानों की आय बढ़ती है और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षण मिलता है।

वास्तव में जीआई टैग केवल किसी उत्पाद का प्रमाण पत्र नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की मेहनत, संस्कृति और इतिहास का सम्मान है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और छोटे कारीगरों को रोजगार के नए अवसर भी प्राप्त हो रहे हैं। साथ ही, भारत की पारंपरिक कला और स्थानीय उत्पाद वैश्विक बाजार में ‘ब्रांड इंडिया’ को मजबूत बना रहे हैं।

उत्तर भारत के राज्यों में हिमाचल प्रदेश अपने पारंपरिक हस्तशिल्प और प्राकृतिक उत्पादों के लिए विशेष पहचान रखता है। कुल्लू शॉल, किन्नौरी शॉल और चंबा रुमाल जैसे उत्पाद देश ही नहीं, विदेशों में भी काफी पसंद किए जाते हैं। कांगड़ा पेंटिंग अपनी खूबसूरत लघु चित्रकला शैली के लिए जानी जाती है, जबकि कांगड़ा चाय अपनी अनोखी सुगंध और स्वाद के कारण अलग पहचान रखती है। इसके अलावा चंबा चप्पल, हिमाचली काला जीरा और चुल्ली का तेल जैसे उत्पाद हिमाचल की पारंपरिक विरासत को मजबूत करते हैं।

उत्तराखंड भी अपने पारंपरिक कृषि उत्पादों और लोक कला के लिए तेजी से पहचान बना रहा है। यहां का मंडुआ, झंगोरा, लाल चावल, गहत और काला भट्ट जैसे मोटे अनाज और दालें स्वास्थ्यवर्धक मानी जाती हैं। मुनस्यारी की राजमा और बद्री गाय का घी भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं। वहीं, ऐपण कला, रिंगाल हस्तशिल्प और भोटिया दान जैसे पारंपरिक उत्पाद उत्तराखंड की सांस्कृतिक समृद्धि को पेश करते हैं। बुरांश का शरबत और बेरीनाग चाय भी राज्य की खास पहचान बन चुके हैं।

पंजाब और हरियाणा के फुलकारी शिल्प और बासमती चावल की मांग दुनिया भर में है। फुलकारी की रंग-बिरंगी कढ़ाई पंजाब की लोक संस्कृति को दिखाती है, जबकि हरियाणा और पंजाब का बासमती चावल अपनी खुशबू और गुणवत्ता के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रसिद्ध है।

उत्तर प्रदेश जीआई टैग उत्पादों के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल है। राज्य के 75 से अधिक उत्पादों को जीआई टैग मिल चुका है। बनारसी साड़ी और ब्रोकेड अपनी शानदार बुनाई और जरी के काम के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। लखनऊ की चिकनकारी, मुरादाबाद का धातु शिल्प, सहारनपुर की लकड़ी नक्काशी और गोरखपुर की टेराकोटा कला राज्य की पारंपरिक कला को नई पहचान दे रही हैं। फिरोजाबाद की कांच की चूड़ियां, मिर्जापुर की दरी, अमरोहा की ढोलक और मेरठ की कैंची भी अपनी गुणवत्ता के कारण खास स्थान रखती हैं। इसके अलावा बनारस की ठंडाई, लाल पेड़ा और जौनपुर की इमरती, मथुरा के पेड़े, भदोही की कालीन जैसे उत्पाद भी अपनी अलग पहचान बना चुके हैं।

राजस्थान के जीआई टैग उत्पाद देश की समृद्ध कला और शिल्प परंपरा का शानदार उदाहरण हैं। जयपुर की ब्लू पॉटरी, सांगानेरी और बगरू प्रिंट अपनी खूबसूरत डिजाइन के लिए प्रसिद्ध हैं। उदयपुर की कोफ्तगिरी कला, नाथद्वारा की पिछवाई कला राजस्थान की ऐतिहासिक कला परंपरा को दुनिया के सामने पेश करते हैं। वहीं, बीकानेर भुजिया, सोजत की मेहंदी, मकराना का संगमरमर और कोटा डोरिया भी दुनिया भर में पहचान बना चुके हैं।

जम्मू-कश्मीर के जीआई टैग उत्पाद भारत की शान माने जाते हैं। कश्मीर का केसर दुनिया के सबसे महंगे मसालों में गिना जाता है। इसकी खुशबू और गुणवत्ता इसे खास बनाती है। कश्मीरी पश्मीना शॉल, कनी शॉल और सोजनी कढ़ाई अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहद लोकप्रिय हैं। इसके अलावा, पेपर माशे कला, अखरोट की लकड़ी की नक्काशी और हस्तनिर्मित कालीन कश्मीर की समृद्ध हस्तकला परंपरा की खूबसूरती को समेटे हैं। जम्मू क्षेत्र का कलारी पनीर, रामबन का शहद और अनारदाना भी तेजी से पहचान बना रहे हैं।

लद्दाख के उत्पाद भी अब वैश्विक स्तर पर अपनी जगह बना रहे हैं। यहां की रक्तसे कार्पो खुबानी अपनी मिठास और स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। सी बकथॉर्न को ‘लद्दाख का सोना’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें औषधीय गुण भरपूर होते हैं। वहीं लद्दाखी पश्मीना और लकड़ी की नक्काशी स्थानीय कला और परंपरा की खास पहचान हैं।

--आईएएनएस

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