नई दिल्ली, 13 जनवरी (आईएएनएस)। यह सिर्फ एक संत की जीवनगाथा नहीं, बल्कि उस चेतना की कथा है जो खुद अंधकार में जीकर भी समूचे जगत को प्रकाश का मार्ग दिखाती है। यह कहानी है जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज की, जिनकी अंतर्दृष्टि ने शास्त्रों को जीवंत किया, जिनकी वाणी में वेदों की गूंज है और जिनका जीवन त्याग, तपस्या और दिव्य ज्ञान की अखंड साधना का प्रतीक है। शारीरिक दृष्टि से वंचित होकर भी उन्होंने ऐसी दिव्य दृष्टि प्राप्त की, जिसे देखकर सिर्फ हिंदू ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मों से ताल्लुक रखने वाले कहने में हिचके नहीं हैं कि वे एक दिव्य शक्ति हैं।
उत्तर प्रदेश के जौनपुर क्षेत्र में स्थित शांत गांव शांदीखुर्द में एक धर्मनिष्ठ सरयूपारिन ब्राह्मण परिवार का निवास है, जहां जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज की कहानी शुरू होती है। उनके एक धर्मनिष्ठ रिश्तेदार ने भगवान कृष्ण के सम्मान में 14 जनवरी 1950 को मकर संक्रांति के शुभ दिन जन्मे रामभद्राचार्य का नाम गिरिधर रख दिया।
लेकिन, भाग्य ने नन्हें गिरिधर के लिए एक विशेष ताना-बाना बुना था। दो महीने की उम्र में ही उनकी आंखें प्रभावित हो गईं, जिससे वे लगभग दृष्टिहीन हो गए। हालांकि, उनकी यह शारीरिक दिव्यांगता वास्तव में श्रीराम की ओर से दिया गया दिव्य दृष्टि का आवरण था। परिणामस्वरूप, इसके बाद उन्होंने ब्रह्मांड को दिव्य आंतरिक दृष्टि के माध्यम से देखा, जो नश्वर दृष्टि की सीमाओं से परे थी।
विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती ने बालक गिरिधर को अपना दिव्य आशीर्वाद दिया, जिन्होंने छोटी उम्र से ही असाधारण शैक्षणिक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। वे बचपन से ही प्राकृत और संस्कृत में श्लोक लिखते थे, जिनमें उनके अंतर्मन और विचारों की गहराई झलकती थी। उन्होंने अपने दादाजी से प्राचीन ग्रंथों और शास्त्रों का सार सीखा और ऐसे श्लोक लिखे जिनमें सर्वशक्तिमान ईश्वर की दिव्य ध्वनि गूंजती थी।
जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी महाराज की बौद्धिक रुचियों की कोई सीमा नहीं है। उन्होंने 22 भाषाओं के ज्ञान से परिपूर्ण होने के साथ भाषा की सीमाओं को पार करते हुए काव्य रचनाएं कीं। उनकी महानतम कृतियों में चार महाकाव्य, रामचरितमानस जैसे पूजनीय ग्रंथों पर गहन टीकाएं, और आध्यात्मिक ज्ञान की गहराई को उजागर करने वाले आलोचनात्मक संस्करण शामिल हैं।
भविष्य में जगद्गुरु रामभद्राचार्य को सिर्फ इसी दृष्टि से ही नहीं देखा जा सकता है, बल्कि वर्तमान के भव्य राम मंदिर के इतिहास में उनका नाम दर्ज है और लगभग सभी उनके जीवन के इस क्षण से वाकिफ होंगे। फिर भी रामभद्राचार्य के भक्ति और दिव्य शक्ति के इस उदाहरण को जानने और समझने में हर किसी की रुचि रही है।
बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में राम जन्मभूमि मामले पर बहस के दौरान मुस्लिम पक्ष ने यह प्रश्न उठाया कि यदि बाबर ने राम मंदिर ध्वस्त किया था तो तुलसीदास ने इसका उल्लेख क्यों नहीं किया। हिंदू पक्ष के लिए संकट खड़ा हो गया, लेकिन तब रामभद्राचार्य इस समस्या का समाधान बन गए। उन्होंने 15 जुलाई 2003 को हाईकोर्ट में गवाही दी और न्यायाधीश को तुलसीदास के दोहाशतक में लिखे गए उस दोहे का पाठ सुनाया, जिसमें कहा गया है कि बाबर के सेनापति मीर बाकी ने राम मंदिर को ध्वस्त किया था।
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य कहते हैं कि अयोध्या में राम मंदिर के अस्तित्व के 437 प्रमाण न्यायालय में प्रस्तुत किए गए। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों का हवाला देते हुए कहा कि श्री राम के जन्म का उल्लेख वाल्मीकि रामायण के बालखंड के आठवें श्लोक से शुरू होता है। यह सटीक प्रमाण है। इसके बाद स्कंद पुराण में राम के जन्मस्थान का उल्लेख है। इसके अनुसार, राम के जन्मस्थान से 300 धनुषों की दूरी पर सरयू माता बहती है। एक धनुष को चार हाथों से उठाया जा सकता है। यदि आज भी नापा जाए तो सरयू नदी जन्मस्थान से उतनी ही दूरी पर बहती हुई दिखाई देती है। इससे पहले, अथर्ववेद के दशम कांड के 31वें श्लोक के दूसरे मंत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आठ चक्रों और नौ मुख्य द्वारों वाली अयोध्या श्रीराम का निवास स्थान है। उसी अयोध्या में मंदिर और महल है जहां श्रीराम स्वर्ग से आए थे।
रामभद्राचार्य कहते हैं कि वेदों में भी श्रीराम के जन्म के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। इसका प्रमाण ऋग्वेद के दसवें अध्याय में भी मिलता है। रामचरितमानस में यह बात स्पष्ट रूप से लिखी है। तुलसी शतक में कहा गया है कि बाबर के सेनापतियों और दुष्ट यवनों ने राम जन्मभूमि मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद का निर्माण किया और अनेक हिंदुओं की हत्या कर दी। तुलसी शतक में तुलसीदास ने भी इस पर शोक व्यक्त किया है। मंदिर ध्वस्त होने के बाद भी हिंदू संत राम लला की सेवा करते रहे।
सिर्फ हाईकोर्ट नहीं, रामभद्राचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में भी वेद-पुराणों के पुख्ता उदाहरण से भगवान राम के अयोध्या में जन्म लेने की बात साबित की। आंखों से नहीं देख पाने के बावजूद स्वामी रामभद्राचार्य के वेदों के इस सटीक ज्ञान से सुप्रीम कोर्ट के मुस्लिम जज भी उनके कायल हो गए थे। इसके बाद मुस्लिम जज ने उन्हें 'एक दिव्य शक्ति' कहा था।
जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य को विश्व भर के लाखों लोग पूजते हैं। यही कारण है कि दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने अपने 76 सालों के अमर जीवन में भारत की संस्कृति और सांस्कृतिक जागृति के लिए जो कुछ भी किया है, वह अद्वितीय, अतुलनीय और अविस्मरणीय है।
--आईएएनएस
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