मैत्रेयी पुष्पा: आंचलिक जीवन की अनसुनी आवाजों को मुख्यधारा में लाने वाली निर्भीक साहित्यकार

मैत्रेयी पुष्पा : आंचलिक जीवन की अनसुनी आवाजों को मुख्यधारा में लाने वाली निर्भीक साहित्यकार

नई दिल्ली, 29 नवंबर (आईएएनएस)। कहते हैं कि मैत्रेयी पुष्पा को पढ़ते हुए अक्सर एक विरोधाभास सामने खड़ा हो जाता है। एक तरफ उनकी सादगी भरी ग्रामीण वेशभूषा, एक हल्का-सा घूंघट और शर्मीली मुस्कान। वहीं दूसरी तरफ उनकी कलम से निकली आग, जो सामंती समाज के हर बंधन और रूढ़ि की जंजीर को तोड़कर रख देती है।

जरा सोचिए, एक ऐसी महिला, जिसका जन्म 30 नवंबर, 1944 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में हुआ, जिसका जीवन ब्रज और बुंदेलखंड के बीच बीता हो और जो एक दिन तय करती है कि वह भारतीय नारी के उस झूठे आदर्श को नकार देगी, जिसे पुरुषों ने सदियों से गढ़ रखा है।

यही वह सबसे दिलचस्प मोड़ है, जिससे मैत्रेयी पुष्पा का जीवन एक साधारण गृहिणी से क्रांतिधर्मी साहित्यकार में बदल गया। उन्होंने केवल लिखना शुरू नहीं किया, बल्कि उन्होंने सीधे उस दबे-कुचले, शोषित और संघर्षरत ग्रामीण स्त्री की नब्ज पकड़ ली, जिसे हिंदी साहित्य के 'सभ्य' गलियारों में या तो दया की पात्र समझा जाता था या फिर उसे पूरी तरह से अनदेखा कर दिया गया था।

जब उन्होंने अपने उपन्यासों की नायिकाओं को अपनी जिद पर अड़ने, राजनीति करने, बदला लेने और यहां तक कि अपनी यौन इच्छाओं को खुलकर अभिव्यक्त करने का साहस दिया, तब हिंदी साहित्य में एक हलचल मच गई।

मैत्रेयी पुष्पा का लेखन उनके पृष्ठभूमि से अलग नहीं किया जा सकता। ब्रज और बुंदेलखंड की दोहरी संस्कृति ने उन्हें एक अनूठी दृष्टि दी। उन्होंने एमए हिंदी साहित्य में किया, लेकिन उनकी वास्तविक शिक्षा किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में नहीं, बल्कि गांव की चौपालों, खेतों की मेड़ों और उन बंद दरवाजों के पीछे हुई, जहां महिलाएं चुपचाप शोषण सहती थीं।

उनके बचपन का एक बड़ा हिस्सा झांसी के पास खिल्ली गांव और बुंदेलखंड के परिवेश में बीता। यह वह अंचल है जहां वीरता के गीत गाए जाते हैं, लेकिन महिलाओं की आजादी को सामंती जंजीरों में जकड़कर रखा जाता है। मैत्रेयी ने इस मिट्टी की सौंधी खुशबू को महसूस किया और इसकी कठोर सच्चाई को भी देखा। जब वे लिखती हैं, तो पाठक को लगता है जैसे वह किसी कथाकार को नहीं, बल्कि उसी गांव की किसी 'बुआ' या 'काकी' को सुन रहा है, जिसकी बोली में ब्रज और बुंदेलखंडी की खनक है और जिसकी भाषा में बनावट नहीं, केवल जीवन का यथार्थ है। उनके लिए साहित्य केवल कहानी नहीं था, यह उस लोक की आवाज थी जिसे मुख्यधारा ने चुप करा दिया था। यह लोक-जीवन उनके उपन्यास 'बेतवा बहती रही' और 'इदन्नमम्' में अपनी पूरी जीवंतता के साथ सांस लेता है।

उनके लेखन का प्रस्थान बिंदु उनके कालजयी उपन्यास 'इदन्नमम' (1994) से माना जाता है। 'इदन्नमम' का अर्थ है 'यह मेरा नहीं,' जो ऋषि परंपरा के त्याग और परोपकार के सूत्र से आया है, लेकिन मैत्रेयी की नायिका मंदाकिनी (मंदा) के लिए इसका अर्थ है कि उसे शोषण और झूठ से भरा यह समाज स्वीकार नहीं है।

मंदा, तीन पीढ़ियों की कथा के केंद्र में है। वह एक ऐसी ग्रामीण नायिका है, जो केवल घरेलू हिंसा या निजी दुख से नहीं लड़ती, बल्कि वह ग्रामीण राजनीति, आर्थिक पिछड़ापन और सामाजिक रूढ़ियों से जूझती है। उसने शहर की शिक्षा ली, लेकिन गांव की मिट्टी से मुंह नहीं मोड़ा। वह अपनी दादी, प्रेम, और मां, मंदा के संघर्षों को देखती है और तय करती है कि वह बदलाव लाएगी। यह उपन्यास केवल एक कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत के सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने का एक जीवंत, आलोचनात्मक दस्तावेज है, जिसे मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आंचलिक शैली में बुना है।

अगर 'इदन्नमम' वैचारिक बुनियाद रखता है, तो 'चाक' (1997) ग्रामीण राजनीति और स्त्री-सशक्तिकरण पर सीधा हमला है। 'चाक' की नायिका सारंग, संघर्ष की एक ऐसी चिंगारी है जो अपने अपमान और शोषण का बदला लेने के लिए गांव की मुखिया (प्रधान) बनने का फैसला करती है।

सारंग की लड़ाई व्यक्तिगत प्रतिशोध से शुरू होकर पूरे समाज की मुक्ति का रूप ले लेती है। मैत्रेयी पुष्पा यहां यह सिद्ध करती हैं कि ग्रामीण स्त्री केवल घर की देहरी तक सीमित नहीं है। वह सत्ता के केंद्र में बैठकर पुरुष-सत्तात्मक ढांचे को चुनौती देने का माद्दा रखती है।

इसी तरह, 'झूला नट' की शीलो गांव की अनपढ़ होते हुए भी अपने अधिकार और स्वतंत्रता के प्रति जागरूक है। वह अपने दरोगा पति के शोषण को बर्दाश्त नहीं करती।

मैत्रेयी पुष्पा का सबसे बड़ा सामाजिक और साहित्यिक योगदान तब सामने आया, जब उन्होंने 'अल्मा कबूतरी' उपन्यास (2000) लिखा। यह महज एक कहानी नहीं, यह बुंदेलखंड की विलुप्त होती 'कबूतरा जनजाति' के जीवन पर आधारित एक गहन शोध है।

मैत्रेयी पुष्पा ने इन हाशिये पर पड़ी स्त्रियों (भूरीबाई, कदमबाई और अल्मा) के नारकीय जीवन, उनके शौर्य, उनके अपराध और उनकी मानवीय पीड़ा को न केवल जिया, बल्कि उसे पन्नों पर उतार दिया। अल्मा, जो तीसरी पीढ़ी की जागरूक लड़की है, अपनी दादी और मां के संघर्षों से शक्ति लेकर समाज और पुलिस के गठजोड़ को चुनौती देती है। इस उपन्यास के माध्यम से, मैत्रेयी ने साहित्य की परिधि को तोड़ दिया और यह साबित किया कि साहित्यकार का दायित्व केवल अपनी जाति या वर्ग की बात करना नहीं, बल्कि उन अनसुनी आवाजों को मंच देना है, जो युगों से अंधेरे में जी रही हैं।

मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथा 'कस्तूरी कुंडल बसै' (2003) और 'गुड़िया भीतर गुड़िया' (2008) में अपने निजी जीवन और साहित्यिक यात्रा की परतों को खोला है। इन कृतियों में उन्होंने एक लेखक के रूप में अपने संघर्ष, अपने परिवार के दबाव और सामाजिक निंदा को साहस के साथ स्वीकार किया। उनका स्पष्ट मत था कि नारी विमर्श का मतलब केवल महिलाओं के दुख-दर्द को दिखाना नहीं है, बल्कि उन्हें अपनी इच्छाओं और स्वतंत्रता को व्यक्त करने की शक्ति देना है।

मैत्रेयी पुष्पा की कथायात्रा हिंदी साहित्य के लिए एक मील का पत्थर है। उन्होंने गांव की भाषा, लोक की ताकत और स्त्री के अदम्य साहस को एक साथ मिलाकर एक ऐसा यथार्थवाद गढ़ा, जो प्रेमचंद और रेणु की परंपरा को आगे बढ़ाता है, लेकिन आधुनिक स्त्री-चेतना से लैस है।

--आईएएनएस

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