नई दिल्ली, 29 अप्रैल (आईएएनएस)। मासिक धर्म को हर महीने होने वाली साधारण प्रक्रिया के तौर पर देखा जाता है, लेकिन यह केवल सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि महिला के शरीर के शुद्धिकरण की प्राकृतिक प्रक्रिया मानी जाती है।
आयुर्वेद में इसे “आर्तव चक्र” कहा गया है और महिला स्वास्थ्य का मूल आधार माना गया है, लेकिन आज के समय में खराब जीवनशैली की वजह से मासिक धर्म में गड़बड़ी, दर्द होना, पेडू पर सूजन आना, और गर्भाशय में सिस्ट का होना तेजी से बढ़ती समस्याएं बनती जा रही हैं। इससे हार्मोन संतुलन और प्रजनन क्षमता पर फर्क पड़ता है।
चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में मासिक धर्म को “आर्तव प्रवृत्ति” कहा गया है, जो हर महीने 3 से लेकर 5 दिनों तक होता है। हालांकि, जीवन शैली बिगड़ने से मासिक चक्र में गड़बड़ी हो जाती है, और इसके पीछे का कारण है शरीर के तीनों दोष। वात दोष असंतुलन से कमर दर्द और शरीर में ऐंठन बनी रहती है, और पित्त दोष असंतुलन से रक्त का प्रवाह अधिक हो जाता है और शरीर में जलन और गर्मी महसूस होती है, जबकि कफ दोष असंतुलन से शरीर भारी और सुस्त महसूस करता है।
आयुर्वेद में मासिक धर्म को नियमित करने के कई उपाय बताए गए हैं, जिसमें पहला उपाय है संतुलित आहार। संतुलित आहार में हरी पत्तेदार सब्जियां और मौसमी फल खाने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही तैलीय, मसालेदार और जंक फूड खाने से परहेज करना चाहिए। आयुर्वेदिक औषधियां भी मासिक धर्म को नियमित करने में मदद कर सकती हैं। अशोक, शतावरी और लोध्र जैसे औषधीय तत्व हार्मोन संतुलन में सहायक होते हैं और मासिक धर्म को नियमित कर दर्द से राहत दिलाते हैं। हालांकि सेवन से पहले सही मात्रा और समाधान के लिए चिकित्सक की सलाह जरूर लें।
मासिक धर्म को नियमित करने के लिए नियमित दिनचर्या का होना भी जरूरी है। देर रात तक जागना और नींद की कमी हार्मोनल असंतुलन बढ़ा सकती है। समय पर सोना-उठना आवश्यक है और इसके साथ ही रोजाना सुबह योग और प्राणायाम जरूर करें। भद्रासन, पवनमुक्तासन और अनुलोम-विलोम मासिक धर्म को नियमित करने में मददगार हैं।
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