नई दिल्ली, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। अंतरिक्ष की दुनिया में कई ऐसे रहस्य छिपे हैं, जिनके बारे में वैज्ञानिक लगातार खोज कर रहे हैं। इन्हीं में से एक है ग्रेविटेशनल वेव्स या गुरुत्वाकर्षण तरंगें, जिन्हें अंतरिक्ष की अदृश्य लेकिन बेहद तेज लहरों के रूप में जाना जाता है। ये तरंगें प्रकाश की गति से चलती हैं और अपने रास्ते में आने वाली चीजों को सिकोड़ती और फैलाती हैं।
गुरुत्वाकर्षण तरंगें ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली घटनाओं से पैदा होती हैं। ये तरंगें इतनी सूक्ष्म होती हैं कि इन्हें महसूस करना लगभग असंभव है लेकिन आधुनिक विज्ञान ने इन्हें सफलतापूर्वक पकड़ लिया है। लगभग 100 वर्ष पहले महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने अपनी सामान्य सापेक्षता सिद्धांत में गुरुत्वाकर्षण तरंगों की भविष्यवाणी की थी। उन्होंने कहा था कि जब दो बड़े पिंड जैसे तारे या ब्लैक होल एक-दूसरे की तेजी से परिक्रमा करते हैं या आपस में टकराते हैं, तो वे अंतरिक्ष में लहरें पैदा करते हैं। ये लहरें ठीक उसी तरह फैलती हैं जैसे शांत तालाब में पत्थर फेंकने पर पानी में लहरें उठती हैं।
अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा गुरुत्वाकर्षण तरंगों के उत्पन्न होने के पीछे की घटनाओं के बारे में जानकारी देता है। सबसे मजबूत गुरुत्वाकर्षण तरंगें उन घटनाओं से पैदा होती हैं, जहां वस्तुएं बेहद तेज गति से घूमती या टकराती हैं। जैसे दो ब्लैक होल का आपस में टकराना और विलय होना, दो न्यूट्रॉन स्टार या बड़े तारों का मर्जर, तारे का फटना या सुपरनोवा। ये घटनाएं ब्रह्मांड में बहुत दूर घटित होती हैं, इसलिए जब तरंगें पृथ्वी तक पहुंचती हैं तो बेहद कमजोर हो चुकी होती हैं।
साल 2015 में वैज्ञानिकों ने पहली बार गुरुत्वाकर्षण तरंगों का सीधा पता लगाया था। अमेरिका में स्थित लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल वेव ऑब्जरवेटरी (एलआईजीओ) ने यह ऐतिहासिक खोज की। यह सिग्नल 1.3 अरब वर्ष पहले दो ब्लैक होल के टकराने से उत्पन्न हुआ था, जो सितंबर 2015 में पृथ्वी पर पहुंचा। इस खोज की घोषणा फरवरी 2016 में की गई। इससे आइंस्टीन की भविष्यवाणी सही साबित हुई।
अब सवाल है कि एलआईजीओ कैसे काम करता है? तो बता दें कि इसमें दो एल-आकार की भुजाएं होती हैं, जिनकी लंबाई 4 किलोमीटर (लगभग 2.5 मील) है। जब गुरुत्वाकर्षण तरंग गुजरती है तो ये भुजाएं बेहद सूक्ष्म रूप से सिकुड़ती और फैलती हैं। एलआईजीओ लेजर किरणों, दर्पणों और अत्यधिक संवेदनशील उपकरणों की मदद से इस बदलाव को मापता है। यह बदलाव प्रोटॉन के आकार से भी हजारों गुना छोटा होता है, फिर भी एलआईजीओ इसे पहचान लेता है।
एलआईजीओ से पहले वैज्ञानिक ब्रह्मांड का अध्ययन मुख्य रूप से प्रकाश की तरंगों या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स से करते थे। गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगने से ब्रह्मांड को समझने का नया तरीका मिल गया है। इससे ब्लैक होल, न्यूट्रॉन स्टार और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में नई जानकारी मिल रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भविष्य में यह गुरुत्वाकर्षण के गहरे रहस्यों को सुलझाने में मदद करेगा।
एलआईजीओ के अलावा वीआईआरजीओ और केएजीआरए जैसे अन्य डिटेक्टर भी गुरुत्वाकर्षण तरंगों का अध्ययन कर रहे हैं। वास्तव में यह क्षेत्र विज्ञान की सबसे रोमांचक खोजों में से एक बन गया है।
--आईएएनएस
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