मुंबई, 1 जून (आईएएनएस)। हिंदी सिनेमा के इतिहास में 'शोमैन' का नाम एक ऐसे कलाकार के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अभिनय, निर्देशन और निर्माण के क्षेत्र में नई मिसाल कायम की। हम बात कर रहे हैं राज कपूर की, जिनकी सफलता की कहानी संघर्ष, जुनून और आत्मविश्वास का शानदार उदाहरण है। आज भले ही उनका नाम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के सबसे बड़े कलाकारों में गिना जाता है, लेकिन उनके शुरुआती दिनों में हालात कुछ अलग ही थे।
14 दिसंबर 1924 को पेशावर में जन्मे राज कपूर का पूरा नाम रणबीर राज कपूर था। वह अभिनेता और थिएटर कलाकार पृथ्वीराज कपूर के बेटे थे। परिवार का माहौल कला और थिएटर से जुड़ा हुआ था, इसलिए बचपन से ही उनका झुकाव फिल्मों की ओर था। हालांकि, युवावस्था में राज कपूर का अधिकांश समय फिल्मों और अभिनय के सपनों में बीतता था, जिसे देखकर उनके पिता कई बार चिंतित हो जाते थे।
कहा जाता है कि पृथ्वीराज कपूर को लगता था कि राज पढ़ाई और अन्य कामों पर कम ध्यान देते हैं और फिल्मों में ज्यादा खोए रहते हैं। इसी कारण वह अक्सर अपने बेटे के भविष्य को लेकर परेशान रहते थे। करियर को लेकर चिंतित पिता अक्सर कहा करते थे 'राज कुछ नहीं कर पाएगा'। लेकिन उन्होंने बेटे की रुचि को समझते हुए उसे सही दिशा देने का फैसला किया।
पृथ्वीराज कपूर ने उस दौर के सफल फिल्मकार केदार शर्मा से मुलाकात की और राज कपूर को उनके पास भेजा। केदार शर्मा ने उन्हें अपने साथ सहायक के रूप में काम करने का अवसर दिया। शुरुआती दिनों में राज कपूर सेट पर छोटे-छोटे काम करते थे, जिनमें क्लैप देना भी शामिल था। यही वह दौर था, जहां से उनके फिल्मी सफर की असली शुरुआत हुई।
इस दौरान राज कपूर ने फिल्मों की बारीकियों को बहुत करीब से समझा। वह हर काम को पूरी लगन से सीखने की कोशिश करते थे। उनके समर्पण और अभिनय में रुचि को देखकर केदार शर्मा ने महसूस किया कि उनमें एक सफल अभिनेता बनने की क्षमता है। इसके बाद उन्होंने वर्ष 1947 में फिल्म ‘नीलकमल’ में राज कपूर को मुख्य भूमिका दी। इस फिल्म में उनके साथ अभिनेत्री मधुबाला नजर आई थीं।
‘नीलकमल’ ने राज कपूर को पहचान दिलाई, लेकिन उनका सपना इससे कहीं बड़ा था। उन्होंने केवल अभिनेता बनकर नहीं रहना चाहा, बल्कि फिल्म निर्माण और निर्देशन में भी अपनी छाप छोड़ने का लक्ष्य बनाया। इसी सोच के साथ उन्होंने 1948 में फिल्म ‘आग’ का निर्माण और निर्देशन किया। हालांकि यह फिल्म उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं रही, लेकिन राज कपूर ने हार नहीं मानी।
इसके बाद 1949 में आई फिल्म ‘बरसात’ ने उनकी किस्मत बदल दी। फिल्म की कहानी, संगीत और अभिनय को दर्शकों का खूब प्यार मिला। इसी फिल्म के साथ संगीतकार शंकर-जयकिशन, गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों की टीम भी बनी, जिसने आगे चलकर हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए।
साल 1950 भी राज कपूर के लिए शानदार साबित हुआ। उनकी कई फिल्में रिलीज हुईं और दर्शकों ने उन्हें खूब सराहा। लेकिन असली अंतरराष्ट्रीय पहचान उन्हें फिल्म ‘आवारा’ से मिली। इस फिल्म ने न सिर्फ भारत में, बल्कि विदेशों में भी लोकप्रियता हासिल की। राज कपूर का अभिनय और फिल्म का संगीत दुनिया के कई देशों में पसंद किया गया।
राज कपूर की बढ़ती सफलता को देखकर पृथ्वीराज कपूर का नजरिया भी बदल गया। एक समय जो पिता बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित थे, वही बाद में गर्व से कहने लगे कि आज राज को लोग उनके बेटे के रूप में जानते हैं, लेकिन एक दिन ऐसा आएगा, जब लोग उन्हें राज कपूर के पिता के रूप में पहचानेंगे।
समय ने साबित किया कि पृथ्वीराज कपूर की यह बात बिल्कुल सही थी। राज कपूर ने अपने करियर में ‘आवारा’, ‘श्री 420’, ‘संगम’, ‘मेरा नाम जोकर’ और ‘बॉबी’ जैसी कई यादगार फिल्में दीं। अभिनय, निर्देशन और निर्माण के क्षेत्र में उनके योगदान ने उन्हें भारतीय सिनेमा का ‘शोमैन’ बना दिया।
--आईएएनएस
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